--> आदिकाल की जैन काव्य धारा के कवि और उनकी रचनाएँ | jain kavya aur kavi - हिंदी सारंग
Home आदिकालीन साहित्य / जैन कवि / जैन काव्य / वस्तुनिष्ठ इतिहास / aadikal / jain kavya

आदिकाल की जैन काव्य धारा के कवि और उनकी रचनाएँ | jain kavya aur kavi

आदिकालीन जैन साहित्य-

जैन कवियों द्वारा लिखे गए ग्रंथ ‘रास’ काव्य परम्परा के अंतर्गत आते हैं। इन ग्रन्थों में जैन धर्म से जुड़े व्यक्तिओं को ही चरित-नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सर्वाधिक ‘चरित काव्य’ जैन साहित्य में ही रचे गए। इन ग्रंथों एवं कवियों का मूल उद्देश्य धर्म तत्व का निरूपण करना है। धर्म प्रचार के साथ इन ग्रन्थों में नीति निरूपण भी मिलता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात कि ‘रास’ ग्रंथो के प्रमुख कथानक श्रोत ‘जैन पुराण’ हैं। इन ‘रास’ ग्रन्थों में जैन तीर्थकरों के जीवन-चरित तथा वैष्णव-अवतारों की कथाएं जैन आदर्शों के आवरण में पद्यबद्य की गई हैं। ‘रासो’ ग्रन्थों की तरह इन ग्रन्थों में भी छन्दों की विविधता दिखाई पड़ती है। इन ग्रन्थों की भाषा ‘अपभ्रंश’ है। जैन (रास) साहित्य मुक्तक एवं प्रबंध दोनों काव्य रूपों में मिलता है। अधिक्तर जैन साहित्य का विकास मध्यदेश के पश्चिमोत्तर में हुआ।

jain-kavya-aur-kavi

जैन साहित्य के प्रमुख कवि और उनके ग्रंथ-

कवि
   काव्य ग्रंथ
 रचनाकाल
देवसेन
श्रावकाचार

लघुनय चक्र

दर्शनसार

933 ई.

-

-
शलिभद्र सूरी
भारतेश्वर बाहुबली रास

बुद्वि रास

पंच पांडव चरित रास

1184 ई.

-

-
विनय चंद्र सूरि
नेमिनाथ चौपाई
1200 ई.
आगसु
चंदनबाला रास

जीव दया रास

1200 ई.
-
जिनधर्म सूरि
स्थूलिभद्र रास
1209 ई.
विजय सेन सूरि
रेवंत गिरि रास
1231 ई.
सुमति गुणि
नेमिनाथ रास
1213 ई.
हेमचंद्र
कुमारपाल चरित

देशीनाममाला कोष

हेमचंद्र शब्दानुशासन

प्राकृतानुशासन

छंदोंनुशासन

त्रिसष्टि शालाकापुरुष चरित
12वीं शताब्दी

-

-

-

-

-
प्रज्ञा तिलक
कच्छुली
-
सार मूर्ति
जिनि पदम् सूरि रास
-
उदयवंत
गौतम स्वामी रास
-
सोमप्रभा सूरि
कुमारपाल प्रतिबोध
13वीं शताब्दी
मेरुतुंग
प्रबंध चिंतामणि
13वीं शताब्दी
कनकामर मुनि
करकंड चरित


आदिकालीन ‘जैन’ (रास) साहित्य संबंधी प्रमुख तथ्य-

1. गणपति चंद्र गुप्त ने ‘शलिभद्र सूरी’ द्वारा रचित ग्रंथ ‘भारतेश्वर बाहुबली रास’ को हिंदी का प्रथम रास काव्य (jain kavya) मानते हैं। यही मत सर्वमान्य भी है।

2. मुनिजिन विजय ने भी शालिभद्र सूरि द्वारा रचित ग्रंथ ‘भारतेश्वर बाहुबली रास’ को ‘रास’ परम्परा का प्रथम ग्रंथ माना है।

3. देवसेन की श्रावकाचार को हिंदी का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।

4. ‘विनय चंद्र सूरि’ कृति ‘नेमिनाथ चौपाई’ ग्रंथ से प्रथम 12 मासा का वर्णन चौपाई छंद में पहली बार मिलता है।

5. हिंदी साहित्य में प्रथम 12 मासा का वर्णन ‘बीसलदेव रासो’ से माना जाता है।

6. चरित, आचार, रास, फागु आदि शैलियों में जैन साहित्य रचा गया है। लेकिन सबसे लोकप्रिय काव्य शैली रास है।

7. हजारी प्रसाद द्विवेदी- “अगर उनकी (जैनों की) रचनाओं के ऊपर से ‘जैन’ विशेषण हटा दिया जाय तो वे योगियों और तांत्रिकों की रचनाओं से बहुत भिन्न नहीं लगेंगी।”

8. जैन कविओं ने ‘कृष्ण कथा’ को ‘हरिवंश पुराण’ कहा है।

9. जैन परम्परा के प्रथम कवि ‘स्वयंभू’ थे।

10. ‘जोइंद और रामसिंह’, ‘सिद्धों’ की तरह ‘सहज’ पर जोर देने वाले प्रमुख जैन कवि हैं।

देवसेन-

1. ग्रंथ के रूप में हिंदी की प्रथम साहित्यिक रचना ‘श्रावकाचार’ है।

2. ‘श्रावकाचार’ की रचना ‘दोहा’ छंद में हुई है।

3. ‘द्रव्यस्वभावप्रकाश’ अपभ्रंश भाषा में रचा हुआ ग्रंथ है।

शालिभद्र सूरि-

1. ‘भारतेश्वर बाहुबली रास’ 250 छंदों में रचित ‘खंड काव्य’ है।

2. ‘भारतेश्वर बाहुबली रास’ में भरतेश्वर तथा बाहुबलि का चरित वर्णन है। इन दोनों राजाओं की       वीरता, युद्ध आदि के वर्णन के साथ विरक्ति और मोक्ष का भाव प्रतिपादित किया गया है।

3. ‘बुद्वि रास’ ग्रंथ 63 छंदों में रचित है। जिसका वर्ण्य विषय धर्मोपदेश है।

4. ‘पंच पांडव चरित रास’ हिंदी का प्रथम ऐतिहासिक रास ग्रंथ है।

आगसु-

1. ‘चंदनबाला रास’ 35 छंदों का कथात्मक काव्य संग्रह है।

2. इस ग्रंथ में चंदनबाला के ब्रह्मचर्य, सयंम, सतीत्व और उत्कर्ष का चित्रण किया गया है।

जिनधर्म सूरि-

1. ‘स्थूलिभद्र रास’ काव्य में तीन प्रमुख पात्र हैं- वेश्या, स्थूलिभद्र तथा इनके गुरु भाई मुनि

2. इस ग्रंथ में स्थूलिभद्र के सयंमित जीवन को चित्रित किया गया है।

विजय सेन सूरि-

1.रेवंत गिरि रास’ ग्रंथ में तीर्थकर नेमिनाथ की प्रतिमा और ‘रेवंत गिरि’ तीर्थ का वर्णन है।

2. यह एक ऐतिहासिक गीत प्रधान रास ग्रंथ है जो चार कड़वकों में विभक्त है।

सुमति गुणि या गणि-

1. ‘नेमिनाथ रास’ 58 छंदों में रचित ग्रंथ है। इसमें नेमिनाथ के चरित को प्रतुत किया गया है, नेमिनाथ के प्रसंग में ही ‘कृष्ण’ का वर्णन भी हुआ है।

हेमचंद्र-

1. हेमचंद्र गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह के समकालीन थे।

2. हेमचंद्र को ‘कलिकाल सर्वज्ञ’ भी कहा जाता है।

3. प्राकृत भाषा के लिखने के कारण इन्हें प्राकृत का ‘पाणिनि’ भी कहा जाता है।

4. ‘हेमचंद्र शब्दानुशासन’ प्राकृत-अपभ्रंश का व्याकरण है।

सोमप्रभा सूरि-

1. ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ गद्यपद्यमय, संस्कृत-प्राकृत काव्य है।

मेरुतुंग-

1. ‘प्रबंध चिंतामणि’ ग्रंथ संस्कृत ग्रंथ ‘भोजप्रबंध’ के ढंग से लिखा गया है।

2. ‘प्रबंध चिंतामणि’ ग्रंथ में बहुत से पुराने राजाओं के आख्यान संग्रहीत हैं।

3. ‘प्रबंध चिंतामणि’ के ही कथानक को आधार बना कर ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी’ ने ‘चारूचंद्रलेख’ उपन्यास लिखा है।

posted by: अनिल कुमार

यह भी पढ़ें :

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

hindisarang.com पर आपका स्वागत है! जल्द से जल्द आपका जबाब देने की कोशिश रहेगी।

to Top