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हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग- नामवर सिंह pdf book download


यहाँ पर प्रगतिवादी आलोचक नामवर सिंह (Namvar Singh) की महत्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तक ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ (Hindi ke Vikas men Aapbransh Ka Youg) का पीडीऍफ़ (pdf) फ़ाइल् दी जा रही है, जिसे आप डाउनलोड कर सकते हैं। साथ में पुस्तक का अनुक्रम भी दिया जा रहा है।

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विषय-सूची


प्रथम खण्ड (भाषा)


1. अपभ्रंश भाषा : उद्भव और विकास

अपभ्रंश संज्ञा, अपभ्रंश का अर्थ, अपभ्रंश शब्द की प्राचीनता, संस्कृत व्याकरण में अपभ्रंश शब्द--गावी-गोणी आदि अपभ्रंश शब्दों का विश्लेषण, भाषा-विशेष के लिए अपभ्रंश शब्द का प्रयोग, अपभ्रंश और देशभाषा, प्राकृत में अपभ्रंश, अपभ्रंश की प्रकृति, प्रकृतिः संस्कृतम्, अपभ्रंश की विशिष्टता, उकार-बहुला भाषा, अपभ्रंश भाषा की आरम्भिक अवस्था, पश्चिमोत्तर भारत की बोली और अपभ्रंश, आभीरी बोली और अपभ्रंश, आभीरादि में आदि कौन?, क्या अपभ्रंश मूलतः प्रजाब, राजस्थान और गुजरात की बोली थी! अपभ्रंश के उत्थान का ऐतिहासिक कारण, अपभ्रंश के भेद, अपभ्रंश के क्षेत्रीय भेद, दक्षिणी अपभ्रंश, पूर्वी अपभ्रंश, परिनिष्ठित अपभ्रंश और उसकी मुख्य विशेषताएँ, लिपि-शैली की कठिनाइयाँ, ध्वनि-परिवर्तन के नियम, रूप-निर्माण की मुख्य प्रवृत्तियाँ।

2. परवर्ती अपभ्रंश और उसमें हिंदी के बीज

परिनिष्ठित अपभ्रंश में देसी बोलियों का मिश्रण, परवर्ती अपभ्रंश में देशभेद, परवर्ती अपभ्रंश का पश्चिमी साहित्य, पश्चिमी प्रदेश के परवर्ती अपभ्रंश की विशेषता, ध्वनि संबंधी प्रवृत्तियाँ,  रूप-निर्माण-संबंधी विशेषताएँ, पूर्वी प्रदेशों का परवर्ती अपभ्रंश साहित्य, पूर्वी प्रदेश के परवर्ती अपभ्रंश की विशेषता, उक्ति-व्यक्ति प्रकरण और मध्य देशीय अपभ्रंश, उक्ति-व्यक्ति प्रकरण की भाषा का नमूना, ध्वन्यात्मक प्रवृत्ति, रूप-रचना, कारक, विभक्ति, सर्वनाम, क्रियापद, आधुनिक भाषाओं का उदय, क्षेत्रीय भेद का कारण, गुजराती, मराठी और बंगला के उदय का कारण, हिन्दी बोलियों का उदय, मैथिली और राजस्थानी, अवधी ब्रजभाषा और खड़ी बोली, हिन्दी बोलियों के उदय पर प्रकाश डालने वाली सामग्री, खड़ी बोली की प्राचीनतम सामग्री।

3. अपभ्रंश से हिंदी का उद्भव और विकास

कारक, विभक्ति, परसर्ग, सर्वनाम- सार्वनामिक, विशेषण, संख्यावाचक विशेषण, क्रिया, काल, रचना, तिङन्त तद्भव, कृदंत तद्भव, संयुक्त काल, संयुक्त क्रिया, अ्रव्यय, वाक्य-विन्यास, शब्द-कोश।

द्वितीय खण्ड (साहित्य)


1. अपभ्रंश साहित्य

अपभ्रंश साहित्य की सामग्री- पुराण साहित्य, राम काव्य : स्वयंभू, त्रिभुवन, पुष्पदत, रामकाव्य के अन्य कवि, कृष्णकाव्य और स्वयभू, कृष्णलीला और पुष्पदंत, पुष्पदंत का आदि पुराण, जैन परम्परा के अन्य पौराणिक पुरुषों संबंधी काव्य, चरित काव्य, नाग कुमार चरिउ, जसहर चरिउ, करकंड चरिउ, कथा काव्य, भविसत्त कहा, जैन मुनियों का रहस्यवादी काव्य, जोइन्दु का परमात्म प्रकाश और योगसार, रामसिंह का पाहुड़दोहा, बौद्ध सिद्ध कवियों की रहस्य साधना, दोहा कोष, श्रृंगार और शौर्य का रोमांस काव्य, हैम प्राकृत व्याकरण के दोहे, मुंज के दोहे, संदेश रासक, नीति और सूक्ति काव्य, गद्य साहित्य, अपभ्रंश साहित्य का ऐतिहासिक महत्व।

2. अपभ्रंश और हिंदी का साहित्यिक संबंध

अपभ्रंश और हिन्दी साहित्य के इतिहासकार, अपभ्रंश और हिन्दी का ऐतिहासिक संबंध, हिन्दी साहित्य का आदिकाल और अपभ्रंश, आदिकालीन हिन्दी साहित्य के अंतर्गत अंतर्विरोध, अपभ्रंश साहित्य के अंतर्गत अंतर्विरोध, परवर्ती अपभ्रंश का रूढ़ काव्य और हिंदी के चारण-काव्यों में उसका निर्वाह, हिंदी में अपभ्रंश की जीवंत परम्परा का विकास, अपभ्रंश लोकगीत और हिंदी के श्रृंगारी मुक्तक, वीसलदेव रास, दोला मारूरा दूहा, अपभ्रंश कथाएँ और हिंदी के आख्यानक काव्य, राम और कृष्ण भक्ति काव्य, अपभ्रंश का सिद्ध साहित्य और हिंदी संत काव्य, काव्य रूप, छंद, हिंदी में अपभ्रंश छंदों का निर्वाह और सुधार, हिंदी में अपभ्रंश के काव्य-रूपों का निर्वाह और सुधार, काव्य रूढ़ियाँ, कथानक संबंधी ‘मोटिफ़’ या रूढ़ि।

उपसंहार

परिशिष्ट : अपभ्रंश-दोहा-संग्रह

सहायक साहित्य

हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग | Hindi ke Vikas men Aapbransh Ka Youg

लेखक :
नामवर सिंह | Namvar Singh
पुस्तक का नाम
हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग |
Hindi ke Vikas men Aapbransh Ka Youg
पुस्तक का साइज़ :
09.73 MB
कुल पृष्ठ :
385
प्रकाशक
साहित्य भवन, इलाहाबाद
प्रकाशन वर्ष
1954, द्वितीय संस्करण
श्रेणी :
आलोचना

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