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संज्ञा की परिभाषा, प्रकार एवं उदहारण


संज्ञा की परिभाषा: किसी भी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण, जाति या भाव, दशा आदि के नाम को संज्ञा (sangya) कहते हैं। वासुदेवनंदन प्रसाद के अनुसार ‘संज्ञा (noun) उस विकारी शब्द को कहते है, जिससे किसी विशेष वस्तु, भाव और जीव के नाम का बोध हो।’[1] यहाँ ‘वस्तु’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है, जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक नहीं, वरन उनके धर्मो का भी सूचक है। साधारण अर्थ में ‘वस्तु’ का प्रयोग इस अर्थ में नहीं होता। अतः वस्तु के अन्तर्गत प्राणी, पदार्थ और धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गये हैं।
एक उदाहरण लेते हैं-
‘शाहजहाँ ने कश्मीर में सेबों की सुंदरता देखी।
उपरोक्त वाक्य में चार नाम हैं जो संज्ञा (noun) को व्यक्त कर रहे, ‘शाहजहाँ एक व्यक्ति का, ‘कश्मीर एक स्थान का, ‘सेब एक वस्तु का, ‘सुंदरता एक गुण का नाम है। ये चारों शब्द संज्ञा के उदाहरण हैं।
sangya-aur-sangya-ke-prakar
hindi grammer

संज्ञा के प्रकार या भेद

संज्ञा (noun) के भेद पर सभी वैयाकरण एकमत नहीं हैं परंतु अधिकतर संज्ञा के पाँच भेद मानते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

1.
व्यक्तिवाचक संज्ञा (vyakti vachak sangya)
2. जातिवाचक संज्ञा (jativachak sangya)
3. भाववाचक संज्ञा (bhav vachak sangya)
4. द्रव्यवाचक संज्ञा (dravya vachak sangya)
5. समूहवाचक संज्ञा (samuh vachak sangya)

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा

जिस शब्द से किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।’[2] जैसे-
a)  व्यक्तियों का नाम- गाँधीजी, कृष्ण, मोहन, राधा, दिनेश;
b)  दिशाओं के नाम- उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व;
c)  देशों के नाम- भारत, नेपाल, चीन, अफगानिस्तान, फ़्रांस;
d)  राष्ट्रीय जातियों के नाम- भारतीय, चीनी, पाकिस्तानी, रूसी;
e)  समुद्रों के नाम- काला सागर, भूमध्य सागर, हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर;
f)   नदियों के नाम- यमुना, ब्रह्मपुत्र, बोल्गा, कृष्णा, कावेरी, सिन्धु;
g)  पर्वतों के नाम- हिमालय, विन्ध्याचल, अलकनन्दा, कराकोरम;
h)  नगरों, चौकों और सड़कों के नाम- वाराणसी, गया, चाँदनी चौक, हरिसन रोड, अशोक मार्ग।
i)   पुस्तकों तथा समाचारपत्रों के नाम- रामचरितमानस, गोदान, आलोचना, दैनिक जागरण, अमर उजाला;
j)   ऐतिहासिक युद्धों और घटनाओं के नाम- पानीपत की पहली लड़ाई, सिपाही-विद्रोह, अक्तूबर-क्रान्ति;
k)  दिनों, महीनों के नाम- जनवरी, मार्च, सितम्बर, बुधवार, रविवार;
l)   त्योहारों, उत्सवों के नाम- होली, दीवाली, रक्षाबन्धन, ईद, क्रिसमस आदि।

2. जातिवाचक संज्ञा

‘जिन संज्ञाओं से एक ही प्रकार की वस्तुओं अथवा व्यक्तिओं का बोध हो, उन्हें जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।[3] जैसे- नागर, गाँव, घर, आम, तोता, नदी, हाथी, मनुष्य, माता, पहाड़ आदि। घर कहने से सभी प्रकार के घर का, नदी कहने से सभी प्रकार की नदियों का, ‘हाथी कहने से सभी हाथियों का, मनुष्य कहने से संसार की मनुष्य-जाति का, पहाड़ कहने से संसार के सभी पहाड़ों का जातिगत बोध होता हैं। कुछ उदाहरण और देखे-
a)  संबंधियों, व्यवसायों, पदों और कार्यों के नाम- मंत्री, बहन, शिक्षक, चोर, धोबी;
b)  पशु-पक्षियों के नाम- बिल्ली, मैना, बुलबुल, भैंस, गधा, गिलहरी, मोर;
c)  वस्तुओं के नाम- मेज, किताब, पेन, चारपाई, अलमारी, मकान;
d)  प्राकृतिक तत्वों के नाम- तूफान, बिजली, भूकंप, ज्वालामुखी, वर्षा आदि।

व्यक्तिवाचक संज्ञा की तरह किसी प्राणी की जाति नहीं बदल सकती, जैसे बैल का उदाहरण लेते हैं- उसकी जाति सदैव बैल ही रहेगी। लेकिन व्यक्तिवाचक संज्ञा बदल सकती है, जैसे- जिस घर में बैल था वे उसे हीरा कह कर पुकारते थे, किसी दूसरे के यहाँ गया तो उसे वो मोती यह शेरू कह कर पुकारने लगे। इस तरह उसका नाम तो बदल सकता है किंतु जाति वही रही, वह न बदली।

3. भाववाचक संज्ञा

‘जिस संज्ञा-शब्द से व्यक्ति या वस्तु के गुण या धर्म, दशा अथवा व्यापार का बोध होता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं।[4] यहाँ पर ‘धर्म’, ‘गुण’, ‘अर्थ और भाव प्रायः पर्यायवाची शब्द हैं। जैसे- लम्बाई, बुढ़ापा, नम्रता, समझ, चाल, मिठास आदि।
हर पदार्थ का धर्म होता है। नींबू में खटास, राजपूतों में वीरता, पानी में शीतलता, आग में गर्मी, मनुष्य में देवत्व और पशुत्व इत्यादि का होना आवश्यक है। पदार्थ का गुण या धर्म पदार्थ से अलग नहीं रह सकता। घोड़ा है, तो उसमे बल है, वेग है और आकार भी है। व्यक्तिवाचक संज्ञा की तरह भाववाचक संज्ञा से भी किसी एक ही भाव का बोध होता है। इस संज्ञा (noun) का अनुभव हमारी इन्द्रियों को होता है और प्रायः इसका बहुवचन नहीं होता।

भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण

भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण जातिवाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, सर्वनाम और अव्यय में प्रत्यय लगाकर बनाया जाता है।

a)  जातिवाचक संज्ञा से- बूढ़ा से बुढ़ापा, लड़का से लड़कपन, मित्र से मित्रता, पंडित से पंडिताई, दास से दासत्व आदि;
b)  विशेषण से- गर्म से गर्मी, सर्द से सर्दी, वीर से वीरता, महा से महिमा, कठोर से कठोरता, धीर से धैर्य, गरम से गरमी, पीला से पीलापन, मीठा से मिठास, चतुर से चतुराई आदि;
c)  क्रिया से- घबराना से घबराहट, छटपटाना से छटपटाहट, सजाना से सजावट, चढ़ना से चढ़ाई, बहना से बहाव, मारना से मार, काटना से काट, दौड़ना से दौड़, वंच से वंचना आदि;
d)  सर्वनाम से- अपना से अपनापन, आप से आपा, मम से ममता, अहं से अहंकार, निज से निजत्व आदि;
e)  अव्यय से- दूर से दूरी, समीप से समीप्य, शाबाश से शाबाशी, वाहवाह से वाहवाही, परस्पर से पारस्पर्य, निकट से नैकट्य आदि।
f)   धातु से- पढ़ना से पढ़ाई, लिखना से लिखाई, हँसना से हँसाई, लड़ना से लड़ाई आदि।

भाववाचक संज्ञा बनाते समय शब्दों के अंत में प्रायः पन, त्व, ता आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

4. समूहवाचक संज्ञा 

‘जिस संज्ञा से वस्तु अथवा व्यक्ति के समूह का बोध हो, उसे समूहवाचक संज्ञा कहते हैं।[5]
जैसे- व्यक्तियों का समूह- सेना, भीड़, झुंड, जनता, सभा, गिरोह, दल; वस्तुओं का समूह- गुच्छा, कुंज, मण्डल, घौद।

5. द्रव्यवाचक संज्ञा

‘जिस संज्ञा से नाप-तौल वाली वस्तु का बोध हो, उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते है।[6] कहने का तात्पर्य यह है की द्रव्यवाचक संज्ञा से किसी ऐसी वस्तु का बोध होता है, जो पदार्थ तो है परंतु उसे गिना नहीं जा सकता, उसका परिणाम हो सकता है। द्रव्यवाचक संज्ञा का प्राय: बहुवचन नहीं होता है। जैसे- दूध, लोहा, पीतल, चावल, पेट्रोल, घी, तेल, सोना, चाँदी आदि।

नोट- समूहवाचक और द्रव्यवाचक संज्ञाएँ भी जातिवाचक संज्ञाओं के अंतर्गत आ सकती हैं, इसीलिए कई वैयाकरण इसे पृथक नहीं मानते हैं।[7]

संज्ञाओं का प्रयोग

संज्ञाओं (noun) के प्रयोग में कभी-कभी उलटफेर भी हो जाया करता है। कुछ उदाहरण यहाँ दिये जा रहे है-

a)   जातिवाचक: व्यक्तिवाचक 

कभी-कभी जातिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञाओं में होता है। जैसे-
‘गुप्त जी(मैथिलीशरण गुप्त) की कविता ओजपूर्ण है।
यद्यपि भारत में लाखों व्यक्तियों की जाति ‘गुप्त है, किंतु यहाँ ‘गुप्त शब्द जाति का बोधक न होकर एक व्यक्ति विशेष के लिए प्रयुक्त हुआ है।
इसी प्रकार ‘पुरीसे जगत्राथपुरी का देवीसे दुर्गा का, ‘दाऊसे कृष्ण के भाई बलदेव का, ‘संवत्से विक्रमी संवत् का, ‘गाँधी जी से मोहनदास कर्मचन्द गाँधी का, भारतेन्दुसे बाबू हरिश्चन्द्र का और गोस्वामीसे तुलसीदास जी का बोध होता है।
इसी तरह बहुत-सी योगरूढ़ संज्ञाएँ मूल रूप से जातिवाचक होते हुए भी प्रयोग में व्यक्तिवाचक के अर्थ में चली आती हैं। जैसे- गणेश, हनुमान, हिमालय, गोपाल इत्यादि।

b)   व्यक्तिवाचक: जातिवाचक 

कभी-कभी व्यक्तिवाचक संज्ञा का प्रयोग जातिवाचक (अनेक व्यक्तियों के अर्थ) में होता है। ऐसा किसी व्यक्ति का असाधारण गुण या धर्म दिखाने के लिए किया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्तिवाचक संज्ञा जातिवाचक संज्ञा में बदल जाती है। जैसे- गाँधी इस युग के बुद्ध थे; वह अभिनव कालिदास है; यशोदा हमारे घर की लक्ष्मी है; वह कलियुग के भीम हो इत्यादि।
कहने का तात्पर्य यह है की जब व्यक्तिवाचक संज्ञा एक से अधिक का बोध कराये, तो वह जातिवाचक संज्ञा के अंतर्गत आएगी, उदाहरण-
हमारे देश में विभीषणों की कमी नहीं है।
उपरोक्त वाक्य में विभीषणों का अर्थ ‘देशद्रोही’ है, जो व्यक्तिवाचक नहीं बल्कि जातिवाचक शब्द है।

c)   भाववाचक: जातिवाचक 

कभी-कभी भाववाचक संज्ञा का प्रयोग जातिवाचक संज्ञा में होता है। उदाहरणार्थ- ये सब कैसे अच्छे पहरावे है। यहाँ पहरावाभाववाचक संज्ञा है, किन्तु प्रयोग जातिवाचक संज्ञा में हुआ। पहरावेसे पहनने के वस्त्रका बोध होता है।

संज्ञा के रूपान्तर (लिंग, वचन और कारक में संबंध)

संज्ञा (noun) विकारी शब्द है। विकार शब्दरूपों को परिवर्तित अथवा रूपान्तरित करता है। संज्ञा के रूप लिंग, वचन और कारक चिह्नों (परसर्ग) के कारण बदलते हैं।

a)   लिंग के अनुसार

·    नर खाता है- नारी खाती है। 
·    लड़का खाता है- लड़की खाती है।
इन वाक्यों में नरपुंलिंग है और नारीस्त्रीलिंग। लड़कापुंलिंग है और लड़कीस्त्रीलिंग। इस प्रकार, लिंग के आधार पर संज्ञाओं का रूपांतर होता है।

b)   वचन के अनुसार

·    लड़का खाता है- लड़के खाते हैं। 
·    लड़की खाती है- लड़कियाँ खाती हैं। 
·     एक लड़का जा रहा है- तीन लड़के जा रहे हैं।

इन वाक्यों में लड़काशब्द एक के लिए आया है और लड़केएक से अधिक के लिए। लड़कीएक के लिए और लड़कियाँएक से अधिक के लिए व्यवहृत हुआ है। यहाँ संज्ञा के रूपांतर का आधार वचनहै। लड़काएकवचन है और लड़केबहुवचन में प्रयुक्त हुआ है।

c)   कारक-चिह्नों के अनुसार

·   लड़का खाना खाता है- लड़के ने खाना खाया। 
·    लड़की खाना खाती है- लड़कियों ने खाना खाया।
इन वाक्यों में लड़का खाता हैमें लड़कापुंलिंग एकवचन है और लड़के ने खाना खायामें भी लड़केपुंलिंग एकवचन है, पर दोनों के रूप में भेद है। इस रूपांतर का कारण कर्ता कारक का चिह्न नेहै, जिससे एकवचन होते हुए भी लड़केरूप हो गया है। इसी तरह, लड़के को बुलाओ, लड़के से पूछो, लड़के का कमरा, लड़के के लिए चाय लाओ इत्यादि वाक्यों में संज्ञा (लड़का-लड़के) एकवचन में आयी है। इस प्रकार, संज्ञा बिना कारक-चिन्ह के भी होती है और कारक चिह्नों के साथ भी। दोनों स्थितियों में संज्ञाएँ एकवचन में अथवा बहुवचन में प्रयुक्त होती है। उदाहरणार्थ-

i)   बिना कारक-चिह्न के- 
·    लड़के खाना खाते हैं। (बहुवचन)
·     लड़कियाँ खाना खाती हैं। (बहुवचन)

ii)   कारक-चिह्नों के साथ- 
·    लड़कों ने खाना खाया। 
·    लड़कियों ने खाना खाया। 
·     लड़कों से पूछो। 
·     लड़कियों से पूछो। 
इस प्रकार, संज्ञा का रूपांतर लिंग, वचन और कारक के कारण होता है।
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[1] आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना- वासुदेवनंदन प्रसाद, पृष्ठ-72
[2] वही, पृष्ठ- 73
[3] वही, पृष्ठ-73
[4] वही, पृष्ठ-74
[5] वही, पृष्ठ- 74
[6] वही, पृष्ठ- 74
[7] व्यवहारिक हिंदी व्याकरण तथा रचना- हरदेव बाहरी, पृष्ठ- 62

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