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पीएचडी पाठ्यक्रम में हुआ बदलाव, एडमिशन अब और हुआ कठिन


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने पीएचडी पाठ्यक्रम में दो क्रेडिट कोर्स और जोड़ दिए हैं। यह निर्णय आयोग की 543वीं बैठक में लिया गया। यूजीसी द्वारा सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को निर्देश भी दिए जा चुके हैं ताकि अगले सत्र से ये दोनों कोर्स भी पीएचडी कोर्स वर्क में भी शामिल किए जा सकें यूजीसी (ugc) guidelines के अनुसार अब सभी शोधार्थियों को प्री-पीएचडी कोर्सवर्क (phd course work)  के दौरान दो नए क्रेडिट कोर्स की पढ़ाई भी करनी होगी। ये दोनों क्रेडिट कोर्स हैं-

1. प्रकाशन नैतिकता (पब्लिकेशन एथिक्स) और 
2. प्रकाशन कदाचार (पब्लिकेशन मिसकंडक्ट)।
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शोधर्थियों को प्लेगेरिज्म से बचाने की कोशिश


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने यह बदलाव इसलिए किया, ताकि शोधार्थियों में जागरूकता बढ़ाया जा सके और प्लेगरिज्म से भी बचाया जा सके। यूजीसी ने अब प्लेगेरिज्म के नियमों को और कड़ा कर दिया है। यदि कोई शोधार्थी अपने शोध (रिसर्च) में प्लेगरिज्म का दोषी पाया जाता है, तो उनका पंजीकरण (registration) रद किया जा सकता है, साथ ही पर्यवेक्षकों की नौकरी भी जा सकती है।

अभी तक अनुसंधान पद्धति की होती थी पढ़ाई

प्री-पीएचडी कोर्स वर्क के दौरान अभी तक यूजीसी के मानकों के अनुसार संबंधित विषय और रिसर्च मेथोडोलॉजी की पढ़ाई करायी जाती थी। इसमें रिसर्च मेथोडोलॉजी सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक था। इस पाठ्यक्रम में क्वांटेटिव मैथड, कंप्यूटर एप्लीकेशन और पब्लिश रिसर्च रिव्यू जैसे विषय शामिल थे। कोर्सवर्क पूरा होने के बाद शोधार्थियों को सेमेस्टर परीक्षाएं देनी पड़ती थी।

अब पीएचडी कोर्स वर्क में कुल छह मॉड्यूल होंगे


प्री-पीएचडी कोर्स वर्क में पब्लिकेशन एथिक्स और पब्लिकेशन मिसकंडक्ट को शामिल करने के बाद इसमें अब कुल 6 मॉड्यूल होंगे। ये क्रेडिट कोर्स 30 घंटे के होंगे। इसमें फिलॉसफी एंड एथिक्स, साइंटिफिक कंडक्ट, पब्लिकेशन एथिक्स, ओपन एक्सिस पब्लिसिंग, पब्लिकेशन मिसकंडक्ट और डेटाबेस एंड रिसर्च मैट्रिक्स को पढ़ाया जायेगा। इसके अलावा संबंधित विषय पहले की तरह शामिल रहेगा।

परास्नातक में 10 वर्षों का अनुभव रखने पर बनेंगे गाइड

पीएचडी के पाठ्यक्रम बदलने के साथ ही पर्यवेक्षक (supervisor) की योग्यता संबंधी मानक में भी ugc ने बदलाव किया है। अब वे शिक्षक ही गाइड बन सकेंगे, जिनके पास परास्नातक (संबंधित विषय) में 10 वर्षों का अनुभव है। पीएचडी में एडमिशन (admission) अब आसान नहीं होगा, क्योंकी इस नियम से बहुत सारे शिक्षक पर्यवेक्षक नहीं बन पाएंगे। नतीजा यह होगा की अमूमन सभी विश्वविद्यालयों में सीटों की संख्या अपेक्षाकृत कम होगी। जहाँ पहले से ही पीएचडी एडमिशन में मारामारी है, कहना न होगा कि अब विद्यार्थीयों के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी।

मेरा सुझाव
सभी विद्यार्थिओं से मेरा सुझाव यह है की आप लोगों को जिस विश्वविद्यालय से पीएचडी करने का मौका मिले वहाँ पर एडमिशन ले लें। क्योंकी अब पहले से अधिक प्रतिस्पर्धा होगी, सीटों की संख्या भी प्रभावित होने वाली है। 

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