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द्विवेदी युग के कवि और उनकी रचनाएँ

आधुनिक कविता के दूसरे पड़ाव (सन् 1903 से 1916) को द्विवेदी-युग के नाम से जाना जाता है। डॉ. नगेन्द्र ने द्विवेदी युग को ‘जागरण-सुधार कालभी कहा जाता है और इसकी समयावधि 1900 से 1918 ई. तक माना। वहीं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी युग को ‘नई धारा: द्वितीय उत्थान’ के अन्तर्गत रखा है तथा समयावधि सन् 1893 से 1918 ई. तक माना है। यह आधुनिक कविता के उत्थान व विकास का काल है। सन् 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक बने, संपादक बनने के बाद द्विवेदी जी हिंदी भाषा के परिष्कार पर विशेष ध्यान दिया। इन्होंने सरस्वती के माध्यम से कवियों को नायिका भेद जैसे विषय से हट कर अन्य विषयों पर कविता लिखने के लिए प्रेरित किया तथा ब्रजभाषा के स्थान पर काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली का प्रयोग करने का सुझाव दिया ताकि गद्य और काव्य की भाषा में एकरूपता आ सके।


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द्विवेदी जी ने भाषा संस्कार, व्याकरण शुद्धता और विराम चिन्हों के प्रयोग पर बल देकर हिंदी को परिनिष्ठित रूप प्रदान किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है की, ‘खड़ीबोली के पद्य पर द्विवेदी जी का पूरा-पूरा असर पड़ा। बहुत से कवियों की भाषा शिथिल और अव्यवस्थित होती थी। द्विवेदी जी ऐसे कवियों की भेजी हुई कविताओं की भाषा आदि दुरुस्त करके सरस्वती में छापा करते थे। इस प्रकार कवियों की भाषा साफ होती गई और द्विवेदी जी के अनुकरण में अन्य लेखक भी शुद्ध भाषा लिखने लगे।’ द्विवेदी जी की हिंदी साहित्य में भूमिका एक सर्जक के रूप में उतना नहीं है जितना कि विचारक, दिशा निर्देशक, चिंतक एवं नियामक के रूप में।

द्विवेदी युग में प्रकृति को काव्य-विषय के रूप में पहली बार महत्वपूर्ण स्थान मिला। इसके पूर्व प्रकृति या तो उद्दीपन के रूप में आती थी या फिर अप्रस्तुत विधान का अंग बनकर। वहीं इस युग में प्रकृति को आलंबन तथा प्रस्तुत विधान के रूप में मान्यता मिली। द्विवेदी युग में प्रकृति का गतिशील चित्रण न होकर स्थिर-चित्रण हुआ है।

इस युग में अधिकतर कवियों ने द्विवेदी जी के दिशा-निर्देश के अनुसार काव्य रचना कर रहे थे। किन्तु कुछ कवि ऐसे भी थे जो उनके अनुशासन में नहीं थे और स्वच्छंद काव्य सृजन कर रहे थे। इस प्रकार द्विवेदी युग में दो धारा उभर कर सामने आती है- द्विवेदी मंडल के कवि और द्विवेदी मंडल के बाहर के कवि। द्विवेदी मंडल के कवियों की काव्य धारा को ‘अनुशासन की धारा’ तथा द्विवेदी मंडल के बाहर के कवियों को ‘स्वच्छंदता की धारा’ कहा गया।

द्विवेदी मंडल के प्रमुख कवि:

द्विवेदी मंडल के कवियों में मैथलीशरण गुप्त, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, गोपालशरण सिंह, लोचन प्रसाद पाण्डेय और महावीर प्रसाद द्विवेदी आते हैं। बहुत सारे कवि ब्रज भाषा में कविता लिख रहे थे और उनकी विषय वस्तु एवं शैली परम्परागत थी, इन कवियों ने भी द्विवेदी जी एवं सरस्वती से प्रभावित होकर खड़ीबोली तथा नवीन विषयों पर कविता लिखने लगे। इन कवियों में प्रमुख रूप से- अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा 'शंकर' और राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण आदि हैं।

स्वच्छंद काव्य धारा के प्रमुख कवि:

स्वच्छंदतावादी कवि उन कवियों के लिए प्रयोग किया गया जिनके काव्य में रोमानी भाव-बोध व्याप्त था। स्वच्छंदतावादी कवियों ने प्रकृति प्रेम, स्वछंद प्रेम एवं वैयक्तिक स्वातन्त्र्य को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति किया है। इन कवियों की कविताएँ विषय एवं शिल्प की नवीनता लिए हुए है, दूसरी बात यह की ये रचनाएँ युगीन चेतना से हटकर हैं। द्विवेदी मंडल के बाहर (स्वच्छंदता की धारा) के कवियों में श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा ‘शंकर, बालमुकुंद गुप्त, लाला भगवानदीन, राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण, सैयद अमीर अली ‘मीर, कामता प्रसाद गुरू, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ रूप नारायण पांडेय, लोचन प्रसाद पांडेय, राम नरेश त्रिपाठी, ठाकुर गोपाल शरण सिंह, मुकुटधर पाण्डेय आदि प्रमुख हैं।
इन कवियों की प्रमुख विशेषताएँ- प्रकृति का पर्यवेक्षण, उसकी स्वच्छंद भंगिमाओं का चित्रण, देशभक्ति, कथा गीत का प्रयोग, काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति आदि हैं। स्वच्छंदता वादी काव्य की यही धारा आगे चलकर ‘छायावाद’ में बदल जाती है।

द्विवेदी युग में ब्रजभाषा के प्रमुख कवि:

जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, सत्यनारायण ‘कविरत्न’, शिव सम्पत्ति, किशोरीलाल गोस्वामी, सुधाकर द्विवेदी, जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ आदि।

राष्ट्रीय काव्य धारा के प्रमुख कवि:

द्विवेदी-युग में राष्ट्रीय काव्य धारा के अंतर्गत प्रमुख कवि- मैथलीशरण गुप्त, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, राम नरेश त्रिपाठी तथा राय देवीप्रसाद ‘पूर्णआदि हैं। इन कवियों की रचनाओं में राष्ट्रीयता, स्वदेश प्रेम तथा भारत के अतीत गौरव का गान मिलता है।

द्विवेदी युगीन काव्य की प्रवृत्तियाँ:

1. जागरण-सुधार (राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार/सामाजिक चेतना, मानवतावाद आदि)
2. सोद्देश्यता, आदर्शपरकता व नीतिमत्ता
3. राष्ट्रीयता की भावना (देशप्रेम/ अतीत गौरव)
4. समस्या पूर्ति
5. नैतिकता एवं आदर्शवाद
6. विषय-विस्तार, इतिवृत्तात्मकता / विवरणात्मकता व उपदेशात्मकता
7. प्रकृति चित्रण
8. काव्य रूपों की विविधता- प्रबंध काव्य, खंड काव्य व मुक्तक कविता तीनों पर जोर
9. गद्य और पद्य दोनों की भाषा के रूप में खड़ी बोली का प्रयोग, बोधगम्य भाषा।

द्विवेदी युग के प्रमुख प्रबंध काव्य एवं उनके कवि:

1. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: 1. प्रिय प्रवास (1914 ई.) 2. वैदेही वनवास (1940 ई.)
2. मैथलीशरण गुप्त: 1. साकेत (1931 ई.) 2. यशोधरा (1932 ई.)
3. श्यामनारायण पाण्डेय: हल्दीघाटी
4. नाथूराम शर्मा ‘शंकर’: गर्भरण्डारहस्य
5. रामचरित उपाध्याय: रामचरित-चिंतामणि (1920 ई.)

द्विवेदीयुगीन अन्य महत्त्वपूर्ण महाकाव्य एवं उनके कवि

1. उदयशंकर भट्ट: तक्षशिला (1931 ई.)
2. गुरु भक्त सिंह: 1. नूरजहाँ (1935 ई.), 2. विक्रमादित्य (1947 ई.)
3. अनूप शर्मा: 1. सिद्धार्थ (1937 ई.), 2. शर्वाणी (1948 ई.), 3. वर्द्धमान (1951 ई.)
4. श्यामनारायण पाण्डेय: 1. हल्दीघाटी, 2. जौहर (1945 ई.)
5. मोहनलाल महतो: आर्यावर्त (1943 ई.)
6. हरदयालु सिंह: 1. दैत्यवंश (1940 ई.), 2. रावण (1952 ई.)
7. द्वारका प्रसाद मिश्र: कृष्णायन (1943 ई.)
8. बलदेव प्रसाद मिश्र: साकेत संत (1946 ई.)
9. प्रताप नारायण पुरोहित: नल नरेश (1933 ई.)

द्विवेदी युग के प्रमुख खण्ड काव्य एवं उनके कवि:

1. मैथलीशरण गुप्त: 1. रंग में भंग (1909 ई.), 2. जयद्रथ वध (1910 ई.) 3. किसान (1917 ई.) 4. पंचवटी (1925 ई.),
2. राम नरेश त्रिपाठी: 1. मिलन (1917 ई.), 2. पथिक (1920 ई.), 3. स्वप्न (1929 ई.)

द्विवेदी युग के कवि और उनकी रचनाएँ:


कवि रचनाकाल (ई.) काव्य-रचनाएँ
नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ 1859-1932,अलीगढ़ 1. अनुराग रत्न, 2. शंकर सरोज, 3. गर्भरण्डा रहस्य, 4. शंकर सर्वस्व
महावीर प्रसाद द्विवेदी 1864-1938, रायबरेली 1. काव्य-मंजूषा, 2. कविता कलम, 3. सुमन 1923, 4. कान्यकुब्ज-अबला-विलाप, 5. देवी स्तुति शतक, 6. कान्यकुब्जावलीव्रतम्
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ 1865-1947 1. कृष्णशतक 1882, 2. रसिक रहस्य 1899, 3. प्रेमांबुवारिधि 1900, 4. प्रेम प्रपंच 1900, 5. प्रेमांबु प्रश्रवण 1901, 6. प्रेमांबु प्रवाह 1901, 7. प्रियप्रवास 1914, 8. पद्म प्रसून 1925, 9. बोलचाल 1928, 10. चौखे-चौपदे 1932, 12. चुभते-चौपदे 1932, 13. फूल पत्ते 1935, 14. कल्पलता 1937, 15. ग्रामगीत 1938, 16. रसकलस 1940, 17. वैदेही वनवास 1940, 18. हरिऔध सतसई 1940 19. बनवास, 20. पारिजात, 21. काव्योपवन, 22. प्रेम-प्रपंच, 23. मर्म स्पर्श 1956
राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण’ 1868-1915, जबलपुर 1. मृत्युंजय 1904, 2. राम-रावण विरोध 1906, 3. स्वदेशी कुण्डल 1910, 4. वसंत-वियोग 1912, 5. पूर्ण संग्रह, 6. अमलतास, 7. नये सन का स्वागत, 8. नवीन संवत्सर का स्वागत अनुवाद: कालिदास के ‘मेघदूत’ का ब्रजभाषा में ‘धाराधर धावन’ (1902 ई.) नाम से अनुवाद किया है।
रामचरित उपाध्याय 1872-1938 1. राष्ट्रभारती, 2. देवदूत, 3. भारतभक्ति, 4. मेघदूत, 5. सत्य हरिश्चंद्र, 6. रामचरित, 7. रामचरित-चिंतामणि 1920, 8. देवसभा, 9. विचित्र विवाह, 10. सूक्ति मुक्तावली (नीतिपरक काव्य), 11. देवी द्रोपदी
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ 1883- 1972, उन्नाव 1. कृषक-क्रन्दन, 2. प्रेम प्रचीसी, 3. राष्ट्रीय वीणा, 4. त्रिशूल तरंग, 5. करुणा कादंबिनी
मैथली शरण गुप्त 1886-1965 1. रंग में भंग 1909, 2. जयद्रथ वध 1910, 3. भारत-भारती 1912, 4. किसान 1917, 5. पंचवटी 1925, 6. झंकार 1929, 7. विकट भट 1929, 8. गुरुकुल 1929, 9. साकेत 1931, 10. यशोधरा 1932, 11. द्वापर 1936, 12. हिन्दू 1927, 13. जय भारत 1952, 14. विष्णु प्रिया 1957, 15. रंग में भंग, 16. सिद्धराज 1936, 17. पद्य प्रबंध, 18. वैतालिक, 19. गुरुकुल, 20. शकुंतला, 21. वैतालिक 22. प्लासी का युद्ध, 23. काबा और कर्बला 24. विकट भट, 25. हिडिंबा, 26. पृथ्वीपुत्र आदि।
रामनरेश त्रिपाठी 1889-1962, जौनपुर 1. मिलन 1917, 2. पथिक 1920, 3. मानसी 1927, 4. स्वप्न 1929, 5. कविता-कौमुदी
बाल मुकुन्द गुप्त 1865-1907, रोहतक स्फुट कविता 1905
लाला भगवानदीन ‘दीन’ 1866-1930, फतेहपुर 1. वीर क्षत्राणी, 2. वीर बालक, 3. वीर पंचरत्न, 4. नवीन बीन
लोचन प्रसाद पाण्डेय 1886-1959, बालापुर, मध्य प्रदेश 1. प्रवासी, 2. मेवाड़ गाथा, 3. महानदी, 4. पद्य पुष्पांजलि, 5. मेवाड़ प्रेम 6. मृगी दुःखमोचन
गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ 1881-1961 ई.), झालरापाटन मातृवंदना अनुवाद: 1. गोल्डस्मिथ कृत ‘हरमिट’ का संस्कृत श्लोकों में अनुवाद 2, माघ के ‘शिशुपाल वध’ के 2 सर्गों का ‘हिंदी माघ’ नाम से अनुवाद
ठाकुर गोपाल शरण सिंह 1891-1960, रीवा 1. माधवी, 2. मानवी, 3. संचिता, 4. ज्योतिष्मती
रूप नारायण पांडेय 1884, लखनऊ 1. पराग 1924, 2. वन-वैभव
सैयद अमीर अली ‘मीर’ 1873-1937 ई.), सागर 1. उलाहना पंचक, 2. अन्योक्तिशतक
श्रीधर पाठक 1859- 1928 खड़ी बोली में: 1. वनाष्टक, 2. देहरादून- 1915, 3. भारत गीत- 1928, 4. जगत सचाई सार, 5. स्वर्गीय वीणा, 6. धनविजय, 7. सांध्य अटन, 8. गुनवंत हेमंत 1900, 9. जार्ज वंदना (कविता), 10. बाल विधवा (कविता) ब्रजभाषा में: 1. कश्मीर सुषमा 1904, 2. मनोविनोद 1882 अनुवाद: 1. कालिदास का ऋतुसंहार, 2. गोल्डस्मिथ के ‘हरमिट’ का अनुवाद ‘एकांतवासी योगी’, 3. गोल्डस्मिथ के ‘डेजर्टड विलेज’ का अनुवाद ‘उजड़ा ग्राम’, 4. गोल्डस्मिथ के ‘द ट्रेवल’ का अनुवाद ‘श्रांत-पथिक’
मुकुटधर पाण्डेय 1895-1984, बालापुर, मध्य प्रदेश 1. पूजा फूल, 2. कानन कुसुम, 3. प्रेम बंधन, 4. आंसू, 5. उद्गार
जगन्नाथ दास रत्नाकर 1866-1932 1. उद्धव शतक 1929, 2. गंगावतरण 1927, 3. श्रृंगार लहरी, 4. हिंडोला, 5. हरिश्चंद्र संपादित ग्रंथ: 1. बिहारी रत्नाकर, 2. हम्मीर हठ, 3. दीप प्रकाश, 4. कवि कुल कंठाभरण
सत्यनारायण ‘कविरत्न’ 1880-1918 1. भ्रमरदूत, 2. प्रेमकली 3. ह्रदय तरंग (सम्पूर्ण रचनाओं का सं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने किया है) अनुवाद: मैकाले की होरेशस, भवभूति के ‘उत्तररामचरितम’ और मालतीमाधव’ का ब्रज भाषा में अनुवाद
जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ 1. गंगावतरण 1927, 2. उद्धवशतक 1929, 3. हरिश्चन्द्र, 4. हिंडोला 1894, 5. श्रृंगार लहरी, 6. कलकाशी, 7. वीराष्टक। अनुवाद: पोप के ‘एसे ऑन क्रिटिसिज्म’ का रोला छंद में ‘समालोचनादर्श’ शीर्षक से अनुवाद किया।
कामता प्रसाद गुरु 1875-1947, सागर 1. भौमासुर-वध 2. विनय पचासा, 3. शिवाजी, 4. दासी रानी, 5. पद्य पुष्पावली

द्विवेदी युग के प्रमुख कवि और उनकी रचनाओं के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:

01. मैथिलीशरण गुप्त:

मैथिलीशरण गुप्त रामभक्ति कवि माने जाते हैं। इनका जन्म चिरगाँव, झाँसी (1886 ई.) में और निधन 1964 ई. में हुआ था। गुप्त जी राष्ट्रीय काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। मैथिलीशरण गुप्त ने स्वयं को ‘कौटुंबिक कविमात्र’ कहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गुप्त जी को ‘सामंजस्यवादी कवि’ कहा है। गुप्त की प्रथम कविता हेमंतशीर्षक से 1905 ई. में सरस्वती में प्रकाशित हई। वहीं प्रथम काव्य संग्रह ‘रंग में भंग’ है जो 1909 ई. में प्रकाशित हुई थी। इनकी आरम्भिक रचनाएं कलकत्ता से निकलने वाले ‘वैश्वोपकारक’ पत्रिका में छपती थीं। मैथली शरण गुप्त जी ने दो नारी प्रधान काव्य- ‘साकेत’ व ‘यशोधरा’ की रचना की है। मैथिली शरण गुप्त का प्रिय छंद ‘हरिगीतिका’ है, गुप्त जी को द्विवेदी काल में ‘हरिगीतिका’ छंद का बादशाह कहा जाता है।

गुप्त जी ने- 1. प्लासी का युद्ध, 2. मेघनाथ वध, 3. वृत्र संहार का अनुवाद किया। इन्होंने बंगला के माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनाथ वध का विरहिणी ब्रजांगना और वीरांगना शीर्षक से अनुवाद किया एवं ‘मधुप’ उपनाम का प्रयोग करते हुए ‘मेघनाद वध’ में अतुकान्त शैली अपनायी है। चन्द्रहास, तिलोत्तमा, अनघ, गीतिनाट्य तथा यशोधरा इनके चम्पूकाव्य हैं। गुप्त जी ने मार्क्स की पुत्री ‘जैनी’ पर ‘जयिनी’ नामक काव्य लिखा है।

गुप्त जी ने लगभग 40 रचनाओं का सृजन किया है, जिनमें प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नलिखित है-

भारत-भारती:

गुप्त जी के ‘भारत-भारती’ का प्रकाशन 1912 ई. में हुआ था। गुप्त जी को ‘भारत-भारती’ रचना की मूल प्रेरणा ‘मुसद्दसे हाली’ तथा ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफी कृत ‘भारत दर्पण’ पुस्तक से प्राप्त हुई थी। गुप्त जी की ख्याति का मूलाधार ‘भारत-भारती’ ही है। इसमें भारत के अतीत का गौरव गान है। ‘भारत भारती’ ने हिन्दी भाषियों में जाति और देश के प्रति गर्व की भावनाएं जगाई, इस ग्रंथ के प्रकाशन के बाद से ही गुप्त जी ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में विख्यात हुए। इन्हें ‘भारत भारती’ लिखने पर महात्मा गाँधी ने राष्ट्रकवि की उपाधि दी थी। गुप्त जी की राष्ट्रीय चेतना इस ग्रंथ में मुखरित हुई है। इसीलिए अंग्रेजी सरकार ने इस ग्रंथ को जब्त कर लिया था।

साकेत:

साकेत रामकथा पर आधारित एक महाकाव्य है। तुलसी कृत ‘राम चरित मानस’ के पश्चात हिन्दी में राम काव्य का दूसरा प्रसिद्ध ग्रंथ मैथली शरण गुप्त का ‘साकेत’ है। इसका समारंभ 1914 में होता है, तथा 1931 ई. में पूर्ण हुआ। इसमें कुल बारह सर्ग हैं। गुप्त जी को साकेत रचना की मूल प्रेरणा, महावीर प्रसाद द्विवेदी के एक लेख ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ से मिली, जो जुलाई 1908 ई. में सरस्वती पत्रिका में ‘भुजंग भूषण भट्टाचार्य’ छद्म नाम से छपा था। गुप्त जी ने उर्मिला विषयक जैसे उपेक्षित पात्र को नौवें सर्ग में, उसके विरह का विशद वर्णन किया है। आठवें सर्ग में कैकेयी के पश्चाताप को संवेदनशील तरीके से अभिव्यक्त किया है। ‘साकेत’ शब्द मूलतः पालि भाषा का शब्द है जिसका अर्थ अयोध्या है। इसमें 12 सर्ग है। इसे डॉ. नगेन्द्र ने ‘जनवादी काव्य’ कहा है।

यशोधरा:

यह काव्य ग्रंथ गौतम बुद्ध के गृह त्याग की घटना को आधार बनाकर लिखा गया है। इसमें यशोधरा की वेदना मुखर रूप में हमारे सामने आती है। गुप्त जी की बहुउधृत पंक्ति इसी ग्रंथ से है-

‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आंचल में है दूध और आँखों में पानी।।’

गुप्त जी ने 3 नाटक भी लिखे हैं, जिनके नाम हैं- 1. तिलोत्तमा, 2. चंद्रहास, 3. अनघ

02. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’:

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (1865-1947 ई.) को डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त ने आधुनिक काल का सूरदास कहा है। हरिऔध को ‘कवि सम्राट’ भी कहा जाता है।

हरिऔध ने तीन प्रबन्ध काव्य लिखे जो निम्न हैं-


प्रबन्धकाव्य वर्ष ई. सर्ग विषय
प्रिय प्रवास 1914 17 कृष्ण के बचपन से लेकर मथुरा प्रस्थान तक का वर्णन
पारिजात 1937 15 आध्यात्मिक एवं धार्मिक विषयों का वर्णन
वैदेही वनवास 1941 18 इसमें राम के द्वारा सीता के निर्वासन की कथा है।



प्रिय प्रवास:

‘प्रिय प्रवास’ को खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इस ग्रंथ का सर्वप्रथम नाम ‘ब्रजांगना विलाप’ था। यह काव्य संस्कृत के वर्णवृत्तों पर आधारित है। ‘प्रिय प्रवास’ में कुल 17 सर्ग हैं, जिसमें राधा एवं कृष्ण की कथा वर्णित है। ‘प्रिय प्रवास’ पर इन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया था।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा ब्रजभाषा में रचित ‘रसकलश’ (1931 ई.) एक रीति ग्रन्थ है। हरिऔध कृत ‘चुभते चौपदे, चोखे चौपदे’ और ‘बोलचाल’ मुहावरेदार भाषा में लिखा गया है।

03. श्रीधर पाठक:

श्रीधर पाठक (1859-1928 ई.) खड़ीबोली के प्रथम स्वच्छंदतावादी कवि हैं। पाठक जी के कविताओं का विषय देशप्रेम, समाज सुधार और प्रकृति चित्रण है। इन्होंने ब्रजभाषा में मौलिक काव्य ‘कश्मीर सुषमा’ की रचना 1904 ई. में किया।

श्रीधर पाठक द्वारा अनूदित काव्य ग्रंथ निम्नांकित है-


अनूदित रचना वर्ष (ई.) मूल रचना मूल रचनाकार अनूदित भाषा
गडरिये और दार्शनिक शेफर्ड एण्ड फिलाशफर Christina Berglund Germany
एकांतवासी योगी 1886 हरमिट गोल्डस्मिथ खड़ी बोली
उजड़ग्राम 1889 डेजर्टेड विलेज गोल्डस्मिथ ब्रजभाषा
श्रांत पथिक 1902 ट्रैवलर गोल्डस्मिथ खड़ी बोली
ऋतुसंहार ऋतुसंहार कालिदास ब्रजभाषा


श्रीधर पाठक ने ‘एकांतवासी योगी’ की रचना लावनी या ख्याल शैली में की है तथा ‘श्रांत पथिक’ की रचना रोला छंद में की है। पाठक जी द्वारा खड़ी बोली में रचित प्रथम कविता ‘गुनवंत हेमंत’ है तथा खडी बोली की प्रथम पुस्तक ‘एकांतवासी योगी’ है। भारतोत्थान, भारत प्रशंसा, जार्ज वंदना, बाल विधवा आदि श्रीधर पाठक की कविताएँ हैं।

04. महावीर प्रसाद द्विवेदी:

महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938 ई.) का जन्म रायबरेली के दौलतपुर गाँव में हुआ था।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, ‘हम पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी को पद्य रचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं।’ द्विवेदी जी ने गद्य और पद्य दोनों के लिए खड़ी बोली में सामान्य बोलचाल की भाषा को प्राथमिकता देने की वकालत की। द्विवेदी जी के अनूदित और मौलिक लगभग 80 ग्रन्थ हैं।

महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित अनूदित काव्य निम्न हैं-


अनुवाद आधार ग्रंथ
विनय शतक भर्तृहरि भर्तृहरि के वैराग्यशतक का दोहों में अनुवाद
विहार-वाटिका जयदेव के गीतगोविन्द का संक्षिप्त अनुवाद
स्नेह माला भर्तृहरि के श्रृंगार शतक का दोहों में अनुवाद
गंगा लहरी पण्डित राज जगन्नाथ की गंगा लहरी का सवैया में अनुवाद
ऋतु तरंगिणी कालिदास के ऋतुसंहार का छायानुवाद


महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रसिद्ध कविता ‘सरगौ नरक ठेकाना नाहिं’ है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ‘कविता का विषय मनोरंजन एवं उपदेशजनक होना चाहिए। यमुना के किनारे केलि कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के ‘गाटागात’ की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथीपर्यन्त, भिक्षुक से लेकर राजापर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत-सभी पर कविता हो सकती है।’

05. मुकुटधर पाण्डेय:

मुकुटधर पाण्डेय को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने छायावाद का प्रवर्तक स्वीकार किया है। मुकुटधर पाण्डेय जी लोचन प्रसाद पाण्डेय के अनुज थे। इन दोनों को पाण्डे बन्धु भी कहा जाता है। मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय द्विवेदी युग के प्रसिद्ध प्रगीत मुक्तकार माने जाते हैं। इनकी कविताओं का मुख्य विषय रहस्य भावना, प्रेम भावना एवं प्रकृति चित्रण है।

06. रामनरेश त्रिपाठी:

रामनरेश त्रिपाठी स्वच्छन्दतावाद के दूसरे प्रसिद्ध कवि हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीयता की एक संकल्पना विकसित की। देशभक्ति, प्रकृति चित्रण एवं नीति निरूपण इनकी रचनाओं में प्रमुखता से विद्यमान है। उनकी राय में राष्ट्रीयता के तीन खतरे हैं-विदेशी शासन (पराधीनता), एक तंत्रीय शासन (तानाशाही शासन) और विदेशी आक्रमण। इन्हीं तीन विषयों को लेकर त्रिपाठीजी ने काव्य त्रयी- 'मिलन', 'पथिक' 'स्वप्न' की रचना किया, ये तीनों काल्पनिक खण्डकाव्य हैं। रामनरेश त्रिपाठी कृत ‘मानसी’ इनकी फुटकर कविताओं का संग्रह है। इन्होंने ‘कविता कौमुदी’ शीर्षक से आठ भागों में ग्राम-गीतों, उर्द, बांग्ला एवं संस्कृत की कविताओं का संकलन एवं सम्पादन किया है।

07. गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’:

गयाप्रसाद शुक्ल श्रृंगारिक कविताएँ ‘सनेही’ उपनाम से तथा राष्ट्रीय भावनाओं की कविताएँ ‘त्रिशूल’ उपनाम से लिखते थे। ‘सनेही’ जी खड़ी बोली में कवित्त और सवैया छंदों का प्रयोग करने में प्रवीण थे। इन्होंने ‘सुकवि’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया।

08. कामता प्रसाद गुरू:

कामता प्रसाद गुरु के प्रसिद्धि का मूलाधार उनका ‘हिन्दी व्याकरण’ है। इन्हें भाषा का पाणिनी भी कहा जाता है। कामता प्रसाद गुरु का ‘भौमासुर-वध’ और ‘विनय पचासा’ ब्रजभाषा में है तथा ‘पद्य पुष्पावली’ खड़ी बोली में है।

09. नाथूराम शर्मा:

द्विवेदी युग में नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ को ‘कविता-कामिनी कांत’, ‘भारतेंदु-प्रज्ञेन्दु’, ‘साहित्य सुधाकर’ आदि उपाधियों से विभूषित किया गया। नाथूराम शर्मा समस्यापूर्ति और अतिशयोक्तिपूर्ण कविता करने में प्रवीण थे। नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ कृत ‘गर्भरण्डारहस्य’ एक प्रबन्ध काव्य है जिसमें विधवाओं की बुरी स्थिति और देव मन्दिरों के अनाचार का वर्णन किया गया है।

अन्य कवि के बारे में:

1. जगत्राथदास ‘रत्नाकर’ उर्दू में ‘जकी’ उपनाम से कविता करते थे। रत्नाकर ब्रज भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। इनका ग्रंथ ‘उद्धव सतक भ्रमरगीत परम्परा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है।

2. सत्यनारायण ‘कविरत्न’ का ‘भ्रमरदूत’ भी रत्नाकर के ‘उद्धव सतक’ की तरह भ्रमरगीत परम्परा का काव्य है।

3. रामचरित उपाध्याय द्विवेदी युग के प्रमुख सूक्तिकार थे।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद इस उपयोगी जानकारी के लिये।
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