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हिंदी भाषा का क्षेत्र-विस्तार


हिंदी भाषा के क्षेत्र या भौगोलिक विस्तार पर बात करने से पहले दो-तीन बातों पर विचार कर लेना उपयुक्त होगा। जैसे की आपलोग जानते हैं की हिंदी भाषा का एक क्रमिक विकास हुआ है। संस्कृत से पालि, पालि से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंस, फिर अपभ्रंस के कई क्षेत्रीय रूप- शौरसेनी, अर्ध मागधी, मागधी आदि से हिंदी की बोलियों का विकास होता है। शौरसेनी अपभ्रंस से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी तथा पहाड़ी की बोलियों का विकास हुआ है, अर्ध मागधी अपभ्रंस से पूर्वी हिंदी और मागधी अपभ्रंस से बिहारी हिंदी की बोलियों का विकास हुआ है।

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इन पाँचों बोली वर्गों से ही सत्रह या अठारह बोलियों का विकास हुआ है, जो निम्नलिखित है-

अपभ्रंश उपभाषा बोलियाँ
शौरसेनी पश्चिमी हिंदी 1. हरियाणी, 2. खड़ी बोली, 3. ब्रजभाषा, 4. बुन्देली, 5. कन्नौजी, 6. निमाड़ी
राजस्थानी 1. मारवाड़ी, 2. जयपुरी, 3. मेवाती, 4. मालवी
पहाड़ी 1. पश्चिमी पहाड़ी (नेपाली), 2. मध्यवर्ती पहाड़ी (कुमाऊँनी- गढ़वाली)
मागधी बिहारी 1. भोजपुरी, 2. मगही, 3. मैथिली
अर्धमागधी पूर्वी हिंदी 1. अवधी, 2. बघेली, 3. छत्तीसगढ़ी

हिंदी भाषा में उपर्युक्त बोलियों में से किन बोलियों को शामिल किया जाए, विद्वानों में काफी मतभेद रहा है। हलांकि हिंदी साहित्य के इतिहास में सभी बोलियों के साहित्य को हिंदी भाषा के साहित्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। हिंदी को विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा इसी आधार पर माना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से भी यह पूरा क्षेत्र एक-दूसरे के निकट भी है। कुछ विद्वान उर्दू को भी हिंदी की एक शैली मानते हैं। उनके अनुसार उर्दू का आधार भी खड़ी बोली हिंदी ही है, इसके क्रिया पद भी हिंदी से भिन्न नहीं है। क्रिया पद से ही कोई भाषा किसी दूसरी भाषा से भिन्न होती है, अतः इसे हिंदी की अरबी-फारसी प्रभावित शैली मानना चाहिए। यदि इसे मान लिया जाए तो हिंदी भाषा को अठारह बोलियों और उर्दू का सम्मिलित रूप माना जा सकता है।

अब हम हिंदी की बोलियों के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत को जान लेते हैं। जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार “पश्चिमी हिंदी की पाँच (निमाड़ी के अतिरिक्त) और पूर्वी हिंदी की तीन बोलियाँ ही हिंदी में शामिल करनी चाहिए। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने भी अपनी पुस्तक ‘ओरिजन एण्ड डेवलेपमेंट ऑफ बंगाली लैंगएज’ के परिशिष्ट में पूर्वी हिंदी या कोसली और पश्चिमी हिंदी को ही हिंदी कहा है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा और डॉ. भोलानाथ तिवारी भी भाषावैज्ञानिक दृष्टि से पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही हिंदी मानते हैं। यद्यपि डॉ. तिवारी ‘निमाड़ी’ को भी पश्चिमी हिंदी वर्ग में रखने के पक्षधर हैं।”[1]
सनीति कुमार चटर्जी जैसे विद्वान् सिर्फ पश्चिमी हिंदी को ही हिंदी मानता है। उन्होंने हिंदी भाषा को दो वर्गों में विभाजित किया है-

1. आज की परिनिष्ठित हिंदी, जिसकी बोलियाँ हरियाणी और कौरवी (खड़ी बोली) हैं।

2. ब्रजभाषा, बुन्देली और कन्नौजी का समूह।

वर्तमान समय में एक नवीन अवधारणा यह आई है की हिंदी की सभी बोलियाँ दरअसल बोली नहीं बल्कि स्वयं में एक स्वतंत्र भाषा हैं, इसलिए उन्हें हिंदी की बोली नहीं माना जाना चाहिए। परंतु इस तरह की धारणाओं को अभी तक व्यापक महत्व नहीं मिला है। आज भी सभी अठारह बोलियाँ हिंदी भाषा के भाग के रूप में स्वीकृति हैं।


हिंदी का भौगोलिक विस्तार

भौगोलिक विस्तार की दृष्टि से हिंदी भाषा के क्षेत्र को दो वर्गों में विभाजित किया गया है- हिंदी क्षेत्र और अन्य भाषा क्षेत्र। इनका भौगोलिक क्षेत्र का परिचय निम्नलिखित है-

A) हिंदी क्षेत्र

हिंदी भारत के बहुसंख्यक लोगों की भाषा है जो उत्तर भारत के दस राज्यों में बोली-समझी जाती है। इन राज्यों के नाम हैं- 1. हिमाचल प्रदेश, 2. हरियाणा, 3. दिल्ली, 4. उत्तरांचल, 5. उत्तर प्रदेश, 6. राजस्थान, 7. मध्य प्रदेश, 8, छत्तीसगढ़, 9. बिहार, 10. झारखंड। इन दस राज्यों को हिंदी क्षेत्र कहा जाता है। इस विस्तृत भू-भाग में हिंदी के अनेक क्षेत्रीय रूपांतरण प्रचलित हैं। हिंदी क्षेत्र में पांच उपभाषाएं और अठारह बोलियां सम्मिलित हैं। इन बोलियों का भौगोलिक क्षेत्र निम्न लिखित है-

क) पश्चिमी हिंदी क्षेत्र-

पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत पाँच प्रमुख बोलियों का क्षेत्र- हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश (कानपुर तक), मध्य प्रदेश का ग्वालियर, भोपाल, पूरा बुन्देलखण्ड, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, सिवनी तथा छिंदवाड़ा तक फैला हुआ है। इसकी अलग-अलग बोलियों का भौगोलिक विस्तार निम्नलिखित है-

1. खड़ी बोली- खड़ी बोली का क्षेत्र देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर, रामपुर तथा मुरादाबाद है। खड़ी बोली का शुद्ध रूप बिजनौर में बोला जाता है। इस बोली का एक अन्य नाम ‘कौरवी’ भी है।

2. ब्रजभाषा- आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, हाथरस, बदायूं, बरेली, धौलपुर जिले ब्रजभाषा क्षेत्र में हैं।

3. हरियाणवी- हरियाणा प्रदेश तथा दिल्‍ली का देहाती क्षेत्र इस बोली का क्षेत्र हैं। हरियाणा के करनाल, रोहतक, पानीपत, कुरुक्षेत्र, जींद, हिसार आदि जिलों में बोली जाती है। इसे बांगरू बोली भी कहा जाता है।

4. बुंदेली- यह बुंदेलखंड की बोली है। झांसी, जालौन, हमीरपुर, ओरछा, सागर, नृसिंहपुर, सिवनी, होशंगाबाद जिले इसके क्षेत्र में है।

5. कन्नौजी- अवधी और ब्रजभाषा के बीच कन्नौजी भाषा का क्षेत्र है। यह फर्रुखाबाद, इटावा, हरदोई, पीलीभीत, शाहजहाँपुर, कानपुर आदि जिलों में बोली जाती है। इस बोली का केंद्र कन्नौज या फरुखाबाद जिला है।

6. निमाड़ी- निमाड़ी बोली का क्षेत्र खरगौन और खंडवा के बीच का प्रदेश माना जाता है।

ख) पूर्वी हिंदी

जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार पूर्वी हिंदी पश्चिमी हिंदी के पूर्वी और बिहार के पश्चिमी क्षेत्र की भाषा है। पूर्वी हिंदी का क्षेत्र नेपाल के दक्षिणी भाग से लेकर मध्य प्रदेश के बस्तर तक फैला हुआ है। पूर्वी हिंदी के अन्तर्गत तीन बोलियाँ आती हैं- अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी। इन बोलियों का क्षेत्र विस्तार निम्नलिखित है-

1. अवधी- अयोध्या, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर, बस्ती, हरदोई, उन्नाव, फैजाबाद, सुल्तानपुर, रायबरेली, फतेहपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर, प्रतापगढ़ आदि जिले अवधी के क्षेत्र में आते हैं।

2. बघेली- रीवाँ, दमोह, शहडोल, सतना, मैहर, नागौर कोठी, जबलपुर, मण्डला, मिर्जापुर, बालाघाट, बाँदा, फतेहपुर, हमीरपुर में बघेली बोली जाती है।

3. छतीसगढ़ी- विलासपुर, दुर्ग, रायपुर, खैरागढ़, नन्दगांव, कांकेर, सुरगुजा, कोरबा, सारंगढ़ में बोली जाती है।

ग) राजस्थानी-

राजस्थानी मुख्य रूप से राजस्थान की भाषा है। इस भाषा का क्षेत्र राजस्थान के पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में हरियाणा, पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश तथा दक्षिण की ओर गुजरात राज्य तक फैला हुआ है। यह राजस्थान के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों, पूर्वी सिन्ध, भोपाल, इन्दौर, खानदेश, बरार और गुड़गाँव में भी बोली जाती है। राजस्थानी के पूर्व में बुन्देली, पश्चिम में सिन्धी, उत्तर में लहंदा, पंजाबी, हरियाणी तथा दक्षिण में भीली और मराठी बोली जाती है। राजस्थानी में मुख्य रूप से चार बोलियाँ मानी जाती हैं। इन बोलियों का क्षेत्र निम्नलिखित है-

1. मारवाड़ी- जोधपुर, अजमेर, किशनगढ़, मेवाड जैसलमेर, बीकानेर में यह बोली जाती है।

2. मेवाती- इसे उत्तरी राजस्थानी भी कहा जाता है। यह बोली राजस्थान के मेवात क्षेत्र में बोली जाती है।

3. जयपुरी- यह बोली जयपुर, अजमेर की बोली है। यह बोली चारों तरफ से राजस्थानी की बोलियों और उपबोलियों से ही घिरी हुई है। इस बोली का एक नाम ढूंढाणी भी है।

4. मालवी- यह मालवा क्षेत्र की बोली है। इसका अधिकांश क्षेत्र मध्यप्रदेश में और कुछ भाग राजस्थान में पड़ता है। यह मुख्यता: इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, भोपाल के क्षेत्र में बोली जाती है।

घ) पहाड़ी-

पहाड़ी वर्ग की बोलियों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है। पूर्वी पहाड़ी, पश्चिमी पहाड़ी और मध्यवर्ती पहाड़ी। पूर्वी पहाड़ी के अलावा शेष दोनों बोलियों को हिंदी भाषा की बोलियाँ माना जाता है। मध्यवर्ती पहाड़ी की 2 प्रमुख उपबोलियाँ- गढ़वाली और कुमयुँनी हैं। इन बोलियों का क्षेत्र निम्नलिखित है-

1. पश्चिमी पहाड़ी (नेपाली)- यह बोली हिमाचल प्रदेश के शिमला, मण्डी, चम्बा, जौनसार, सिरमौर इलाके में बोली जाती है।

2. गढ़वाली- यह गढ़वाल क्षेत्र की बोली है, उत्तरकाशी, बदरीनाथ, श्रीनगर (गढ़वाल) क्षेत्र में इसका बोलबाला है।

3. कुमायुंनी- उत्तरांचल का कुमायूं क्षेत्र इस बोली का क्षेत्र है। नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत में यह बोली बोली जाती है।

ड़) बिहारी

बिहारी हिंदी क्षेत्र के पूर्व दिशा की उपभाषा है। अनेक भाषाविद भाषावैज्ञानिक दृष्टि से इसे हिंदी का भाग नहीं मानते लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से इसे भी हिंदी का प्रमुख बोली वर्ग रखा जाता है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा भी बिहारी की भोजपुरी बोली को हिंदी के निकट मानते हैं। बिहारी के अन्तर्गत तीन बोलियाँ- भोजपुरी, मगही तथा मैथिल आती हैं। इन बोलियों का भौगोलिक क्षेत्र निम्नलिखित है-

1. भोजपुरी- यह बोली वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती, शाहाबाद, चम्पारण, सारण में बोली जाती है।

2. मगही- यह बोली पटना, गया, पालामाऊ, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर, सारन में बोली जाती है।

3. मैथिली- बिहारी हिंदी के अन्तर्गत आने वाली यह बोली दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया और मुंगेर में बोली जाती है।

B) अन्य भाषा क्षेत्र

हिंदी का प्रयोग हिंदी-क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रयोग हिंदी-क्षेत्र के बाहर भी फैला हुआ है। हिंदी को प्रचारित-प्रसारित करने में अनेक सामाजिक तथा धार्मिक, राजनितिक और साहित्यिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा, राजभाषा और सम्पर्क भाषा है इसलिए सरकार और गैर-सरकारी संस्थाएँ हिंदीतर क्षेत्रों में इसके प्रचार-प्रसार में अब भी लगी हुई हैं। इसके अलावा पर्यटन, टी. वी. और फिल्मों ने भी हिंदी को प्रचारित-प्रसारित करने में भूमिका निभाई। हिंदी क्षेत्र के लोग देश के कोने-कोने में रोजगार, व्यापार और सेवा क्षेत्र की दृष्टि से जहाँ गए वहाँ उन्होंने हिंदी को प्रसारित किया। इसी तरह भारत के बाहर भी अनेक देशों में हिंदी भाषी गए हैं और वहाँ उन्होंने अपनी भाषा को न केवल जीवित रखा बल्कि कई देशों की महत्वपूर्ण भाषाई दर्जा भी दिलाया हुआ है। इस दृष्टि से हिंदी के अन्य भाषा क्षेत्र को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- हिंदीतर भारतीय क्षेत्र और हिंदी का विदेशी क्षेत्र।

क) हिंदीतर भारतीय क्षेत्र

हिंदी भाषा भारत की प्रमुख संपर्क भाषा होने और उसके प्रचार-प्रसार की वजह से गैर-हिंदी भाषी राज्यों तक विस्तारित हुई। तमाम संस्थाएं और व्यक्तियों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया परंतु सर्वाधिक योगदान हिंदीतर भाषा-भाषियों का रहा है। साथ ही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक कारणों से भी हिंदी का प्रचार अन्य भाषा क्षेत्रों में हुआ है। वर्तमान समय में आन्ध्रप्रदेश, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, पंजाब, बंगाल, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, अरूणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप तथा मिजोरम जैसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषियों की संख्या दूसरे स्थान पर है। वहीं महाराष्ट्र, उड़ीसा, दादर व नगर हवेली में हिंदी भाषा-भाषी तीसरे स्थान पर हैं। देश के अन्य राज्यों में अपनी-अपनी भाषा के साथ ही हिंदी का भी प्रयोग करने वाले व्यक्तियों की संख्या काफी है। यदि प्रतिशत के हिसाब से देखें तो हिंदी भाषा जानने वालों की संख्या तो बहुत ज्यादा है।

कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी का भौगोलिक विस्तार सम्पूर्ण भारत में फैला हुआ है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, पश्चिम में महाराष्ट्र, दक्षिण में अंडमान-निकोबार तथा पूर्व में पश्चिम बंगाल तक हिंदी फैली हुई है। इसके अलावा इसका विस्तार उत्तर पूर्व के दुर्गम क्षेत्रों केरल, लक्षद्वीप तथा पांडिचेरी तक है। आन्ध्रप्रदेश के बीजापुर, गोलकुण्डा अहमद नगर, बरार तथा महाराष्ट्र में मुम्बई तक हिंदी की दक्खिनी शैली सैकड़ों वर्षों से है। हिंदी ने कई क्षेत्रों में वहाँ की भाषाओं के कुछ तत्त्व लेकर अपनी एक नई शैली भी विकसित कर ली है, जो काफी प्रचलित है, जैसे- मुम्बइया हिंदी, कोलकतिया हिंदी आदि।

ख) हिंदी का विदेशी क्षेत्र

हिंदी भाषा वर्तमान समय में केवल भारत के सीमाओं तक सीमित नहीं है न केवल भारत की भाषा है। रोजगार की तलाश और आधुनिक व्यवस्था ने इसे भारत के बाहर भी फैलने का अनुकूल माहौल प्रदान किया, जिसकी वजह से विश्व के कई देशों में हिंदी बोली और समझी जाती है। उन देशों में जहाँ हिंदी-भाषियों ने अच्छे भविष्य की तलाश में पलायन कर गये थे, आज वहाँ हिंदी प्रमुख भाषा है। ऐसे देशों में प्रमुख हैं- फीजी, मॉरीशस, सूरिनाम, त्रिनिदाद और दक्षिणी अफ्रीका आदि। 

डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा के अनुसार, ‘फीजी में तो शायद ही ऐसा कोई भारतीय या फीजियन हो जो हिंदी न समझता हो। सम्भवतः इसलिए फीजी में हिंदी को सवैधानिक मान्यता प्राप्त है। फीजी में हिंदी आधी से अधिक जनसंख्या (52%) की मातृभाषा है तथा उसे सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में 1987 तक संसदीय मान्यता भी प्राप्त थी।’[2] फीजी के गैर-भारतीय भी हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं।

सूरिनाम भी इसी तरह का देश है, जहाँ पर भारतीय सबसे पहले 1873 ई. में पहुंचे थे। यहाँ पर भारतीय मूल के लोगों की संख्या सर्वाधिक (39%) है। इन भारतीयों की बोलचाल की भाषा आज भी हिंदी है, जिसे सरनामी हिंदी नाम से जाना जाता है। यह भोजपुरी, अवधी, ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रित रूप है।

दक्षिण अफ्रीका के ‘डरबन’ में भारतीय मूल के निवासी सर्वाधिक हैं। यहाँ की ‘नैताली’ भाषा भोजपुरी हिंदी का ही एक रूप है जो यहाँ विकसित हुई। इसी तरह उजबेकिस्तान और ताजिकिस्तान में भी हिंदी की ही एक विशिष्ट शैली का प्रयोग होता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने जिसे ताजुज्बेकी नाम दिया है। कुछ विद्वान इसे पार्या’ नाम से जानते हैं।

भारत के पड़ोसी देशों, जैसे- नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और श्रीलंका में भी हिंदी बोलने और समझने वाले भारतीयों की काफी संख्या है। नेपाल के 53 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी है। पाकिस्तान में सभी उर्दू भाषी हिंदी समझते और बोलते भी हैं।

इनके अतिरिक्त आजीविका और व्यापार की दृष्टि से अनेक भारतीय विदेशों में बस गए हैं और हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे देशों में प्रमुख हैं- अमरीका, कनाडा, जर्मनी, इंग्लैण्ड, अफ्रीका और खाड़ी के देश। प्रवासी भारतीयों के अतिरिक्त विदेशी मूल के भी अनेक लोग हिंदी भाषा बोलते और समझते हैं। भारत के बाहर जिन देशों में किसी न किसी रूप में हिंदी का प्रचलन है, उसके पीछे इन प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हिंदी भाषा और उसका क्षेत्र भारत और भारत के बाहर विस्तारित करने में दो और चीजों का योग है। पहला फिल्म और उसके गीतों ने हिंदी भाषा को प्रचारित-प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बहुत सारे गैर हिंदी भाषी और विदेशीयों ने फिल्म-संगीत के माध्यम से हिंदी सीखा जिससे इसका क्षेत्र व्यापक हुआ।

हिंदी भाषा के क्षेत्र को विस्तारित करने में ग्लोबलाइजेशन और बाजारवाद का भी महत्वपूर्ण योगदान है। चूंकि हिंदी क्षेत्र एक बड़ा उपभोक्ता वाला बाज़ार है इसलिए तमाम बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों और देशों ने अपने व्यापारिक हित के लिए हिंदी को बढ़ावा दिया। परिणाम स्वरूप हिंदी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फलने-फूलने का मौका मिला।

निष्कर्ष रूप में हिंदी भाषा का भौगोलिक क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है।यह हिंदी भाषी क्षेत्र में कुल जनसंख्या का लगभग 86 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं और शत-प्रतिशत लोग समझते हैं। पूरे भारत में हिंदी बोलने वालों का प्रतिशत 42.88 और हिंदी जानने वालों की संख्या लगभग 73.31 प्रतिशत है। हिंदीतर भारतीय क्षेत्रों और वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा-भाषियों की खासी जनसंख्या है और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। फलतः हिंदी का भौगोलिक क्षेत्र भी फैलता जा रहा है, विस्तारित हो रहा है।



[1] हिंदी भाषा विकास एवं व्यावहारिक प्रयोजन- मुकेश अग्रवाल, पृष्ठ- 30
[2] वही, पृष्ठ- 37

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