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हिंदी के प्रचार-प्रसार में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका- साहित्यिक संस्थाएं


भारतेंदु युग में हिंदी साहित्य निर्माण का कार्य प्रचुर मात्रा में हुआ, खासकर हिंदी गद्य साहित्य में। हिंदी को मजबूत धरातल प्रदान करने में भारतेंदु और भारतेंदु मंडल साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतेंदु मंडल ने हिंदी साहित्य में निबंध, आलोचना, नाटक, प्रहसन, उपन्यास आदि विविध साहित्यिक विधाओं का प्रणयन किया और विविध विषयों से संबंधित ज्ञानवद्धिनी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, यदि यह प्रयास न हुआ होता तो ‘अखिल देशीय संपर्क भाषा के रूप में सैकड़ों वर्ष पूर्व व्यवहृत होने के बावजूद हिंदी को अंग्रेजी का पद दिलाने के लिये किये गये आंदोलन की सफलता अपने आप में अधूरी रहती और शायद स्वतंत्र भारत के संविधान में राजभाषा के रूप में हिंदी को जो कुछ भी महत्व दिया गया है, उससे भी उसे वंचित रहना पड़ता।’

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‘हिंदी भाषा के प्रसार में हिंदी साहित्य का स्तर ऊंचा करने में और हिंदी प्रदेश की जनता को जगाने में भारतेंदु जी की पत्रकारिता और निबंध-कला ने अपनी अपूर्व भूमिका पूरी की।’[1] हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारतेंदु जी घूम-घूम कर प्रचार भी करते थे। बलिया में हिन्दी प्रचार के लिए बड़ी भारी सभा हुई थी जिसमें भारतेंदु जी ने मार्मिक व्याख्यान दिया था जिसका एक दोहा बहुत लोकप्रिय हुआ था-

‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय कौ सूल॥’

भारतेंदु उच्च कोटि के लेखक और साहित्यकार ही नहीं थे, वे सच्चे अर्थों में स्वदेशी आंदोलन और नवजागरण के अग्रदूत, राष्ट्रीयता के पुजारी और तत्कालीन समाज तथा हिंदी के महान नेता और प्रहरी भी थे। उन्होंने स्वयं अनेक साहित्यिक विधाओं पर न केवल लेखनी चलायी बल्कि अनेक लेखकों के प्रेरणाश्रोत भी बने, प्रश्रय दिया और प्रोत्साहित किया। उनके नेतृत्व में बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, अम्बिकादत्त व्यास, बदरी नारायण चौधरी, श्री निवास दास, ठाकुर जगमोहन सिंह, दुर्गा प्रसाद मिश्र, सुधाकर द्विवेदी, बाल मुकुन्द गुप्त, काशी नाथ खत्री, कार्तिक प्रसाद खत्री, रमाशंकर व्यास, तोताराम, राधाकृष्ण आदि ने हिंदी गद्य और भाषा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।
 
भारतेंदु मंडल के इन साहित्यकारों पर भारतेंदु के व्यक्तित्व का व्यापक प्रभाव पड़ा। भारतेंदु मंडल के बालकृष्ण भट्ट ने अपने निबंधों और हिंदी प्रदीप पत्रिका के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रतापनारायण मिश्र भी हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान की वकालत करते रहे। उन्होंने कानपुर से ‘ब्राह्मण पत्रिका का संपादन किया और सरकारी दफ्तरों में नागरी के प्रवेश के लिए लगातार प्रयास किया। ‘बालकृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र ने हिंदी गद्य के निर्माण में वही योग दिया जो अंग्रेजी में एडिसन और स्टील ने दिया था।’[2] बालकृष्ण भट्ट में जहाँ सामाजिक नेता के साथ निबंधकार, आलोचक एवं नाटककार की उच्चकोटि की प्रतिमा के दर्शन होते हैं तो  वहीं प्रतापनारायण मिश्र  में मनमौजी स्वभाव और हिंदी अनुराग विशेष उल्लेखनीय है।

राधाचरण गोस्वामी का तो हिंदी प्रेम अनूठा रहा है। एक ओर साहित्यिक रंगमंच से गोस्वामी जी की प्रतिभा उच्चकोटि के नाटककार एवं कवियों के पथ प्रदर्शक के रूप में प्रस्फुटित हुई तो दूसरी ओर मालवीय जी के नेतृत्व में हिंदी प्रचार आंदोलन के सच्चे सैनिक के रूप में। एक और विलक्षण साहित्यिक, उत्साही समाज सुधारक और सफल पत्रकार के रूप में अंबिका दत्त व्यास का स्थान काफी ऊंचा है तो दूसरी ओर साहित्य-साधना और हिंदी प्रचार के क्षेत्र में बदरी नारायण चौधरी का नाम उल्लेखनीय है।

भारतेंदु हरिश्चंद के बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी का आगमन होता है, जिन्होंने ‘सरस्वती पत्रिका (1903 ई.) के माध्यम से हिंदी भाषा का परिमार्जन करना प्रारम्भ किया। सरस्वती पत्रिका 1900 ई. से प्रकाशित हो रही थी परन्तु 1903 ई. जब महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रिका के संपादक बने, यह पत्रिका महत्वपूर्ण हो गई।

भारतेंदु युग में भले ही साहित्य के अनेक विधाओं का आगाज और विकास हो चुका था लेकिन साहित्य के क्षेत्र में दो प्रकार की कमियाँ रह गईं थीं। पहला, व्याकरण सम्मत भाषा का अभाव और दूसरा गद्य और पद्य के लिए अलग-अलग भाषा का प्रयुक्त होना। भारतेंदु युग के साहित्यकारों का सारा ध्यान व्याकरण सम्मत भाषा की ओर न जाकर विविध विधाओं पर ही केन्द्रित था। जिसका प्रभाव यह हुआ कि साहित्य में प्रयुक्त होने वाली भाषा, व्याकरण की दृष्टि से काफी शिथिल रही। दूसरी खटकने वाली बात यह भी थी कि गद्य के माध्यम के रूप में तो खड़ी बोली अपना ली गई थी, किंतु पद्य (काव्य) रचना का माध्यम अभी भी ब्रजभाषा बनी हुई थी।

इस असंगति की तरफ महावीर प्रसाद द्विवेदी का ध्यान गया और उन्होंने इसे दूर करने का बीड़ा उठाया तथा ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से सशक्त लेखनी द्वारा इन त्रुटियों का परिमार्जन एवं परिष्कार किया। उन्होंने काव्य में ब्रज भाषा और उसकी श्रृंगारिकता प्रधान कविता का विरोध किया तथा साथ में नवीन काव्य भाषा खड़ी बोली का प्रबल समर्थन किया। द्विवेदी जी ने अनेक कवियों को खड़ी बोली में कविता करने के लिए प्रेरित किया और उनकी भाषाई एवं व्याकरणिक भूलों को दुरुस्त किया।

महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की के आदर्शों पर चलकर साहित्य-सर्जना करने वाले कवियों में प्रमुख रूप से मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह ‘हरिऔध’, शंकर, लोचन प्रसाद पांडेय, रामचरित उपाध्याय, गिरिधर शर्मा और कामता प्रसाद गुरु आदि प्रमुख हैं। मैथिलीशरण गुप्त जिन्हें राष्ट्रकवि का गौरव प्राप्त है, की भाषा परिमार्जित करने का श्रेय द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ को ही है।

खड़ी बोली को समान रूप से गद्य और पद्य का माध्यम स्वीकार कराकर साहित्य को समाजव्यापी बनाना उनका मुख्य ध्येय था।[3] द्विवेदी जी लेखों और पुस्तकों के माध्यम से भाषा संबंधी अपने विचारों को व्यक्त करते रहे जिससे उत्तरोत्तर हिंदी भाषा और साहित्य को आगे बढ़ने में मदद मिली। उनके दो महत्वपूर्ण निबंध ‘भाषा और व्याकरण’ (1906 ई.) और ‘कवि और कविता’ (1907 ई.) हैं जिनमें उनके भाषा संबंधी विचारों को देखा जा सकता है। भाषा और व्याकरण निबंध में उन्होंने सभी पुराने लेखकों की भाषा की आलोचना किया है और कवि और कविता में कवियों के लिए भाषा, भाव, छंद और शैली आदि के संबंध में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं।

महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के सतत प्रयास, प्रोत्साहन व प्रभाव से हिंदी में कई उच्चकोटि के कवि एवं साहित्यकारों का निर्माण हुआ और उनकी रचनाएं ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हईं। वस्तुत: व्याकरण सम्मत भाषा के प्रचार एवं खड़ी बोली पद्य के विकास संबंधी देन के प्रति समस्त हिंदी जगत् महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका का चिर ऋणी रहेगा। उनके इसी योगदान की वजह से उस युग का नाम द्विवेदी युग पड़ा।

कहने का तात्पर्य यह है की भारतेंदु युग में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए उस समय के साहित्यकारों द्वारा एक जमीन तैयार हो गई थी और अनेक नवीन साहित्यिक विधाओं का आगाज़ हो गया था। वहीं द्विवेदी युग में व्याकरण सम्मत भाषा तथा गद्य-पद्य के लिए खड़ी बोली प्रचलन में आ गई थी। जिसका प्रभाव यह हुआ की इनके प्रेरणा से अनेक साहित्यिक संस्थाएं हमारे सामने आती हैं जो हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान करने वाली संस्थाएं निम्नलिखित हैं-

हिन्दी के प्रचार-प्रसार करने वाली प्रमुख साहित्यिक संस्थाएं



क्रम साहित्यिक संस्था स्थापना (ई.)
1 नागरी प्रचारिणी सभा, काशी 1893
2 गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद 1920
3 दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास 1927
4 हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयाग 1927
5 हिन्दी विद्यापीठ, देवघर 1929
6 राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा 1936
7 महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पूना 1937
8 असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गोहाटी 1938
9 हिन्दी विद्यापीठ, बम्बई 1938
10 केरल हिंदी प्रचार सभा, तिरुवनंतपुरम 1939
11 हिंदुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा 1942
12 मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्, बंगलौर 1944
13 महाराष्ट्र, राष्ट्रभाषा सभा, पुणे 1945
14 बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना 1947
15 अखिल भारतीय हिंदी परिषद् 1949
16 साहित्य अकादमी, नई दिल्ली 1954
17 केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्‍ली 1960

1. नागरी प्रचारिणी सभा, काशी

भारतेंदु युग में हिंदी साहित्य का विकास भले ही व्यापक स्तर पर हुआ हो किंतु उसके प्रचार-प्रसार में अनेक बाधाएँ थीं। सबसे बड़ी बाधा रोजगार था, नौकरी पाने के इच्छुक लोग प्रायः अंग्रेजी और उर्दू की शिक्षा ग्रहण करते थे, क्योंकि अंग्रेजी शासकों की भाषा थी और उर्दू अदालतों की। इसी क्रम में 10 मार्च 1893 ई. में क्वींस कॉलेजिऐट स्कूल की पांचवीं कक्षा के कुछ उत्साही छात्रों के द्वारा से काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई, जिसमें बाबू श्यामसुन्दरदास, पं. रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह प्रमुख थे। इसके प्रथम सभापति भारतेंदु जी के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्णदास हुए। बाद में इस संस्था से मदनमोहन मालवीय, अंबिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी, श्रीधर पाठक तथा बदरी नारायण चौधरी आदि विद्वान भी जुड़ते गये।

इस सभा के दो प्रमुख उद्देश्य थे- नागरी अक्षरों का प्रचार और हिन्दी साहित्य की समृद्धि।

सन्‌ 1900 ई. में सभा का उद्योग सफल हुआ और कचहरियों में नागरी के प्रवेश की घोषणा प्रकाशित हुई। इस सभा ने हिन्दी पुस्तकों की खोज का कार्य अपने हाथ में लिया। फलस्वरूप सभा ने हिंदी की कई प्राचीन अनुपलब्ध हस्त लिखित पुस्तकों की खोज की और उनके पाठान्तर को दूर किया, जो देश के कई भागों में बिखरी पड़ीं थीं। इन ग्रंथों में पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो तथा विसलदेव रासो आदि प्रमुख हैं। इस महती कार्य के लिए सरकार ने भी इसे आर्थिक सहायता दी।

नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी साहित्य के अनेक ग्रंथों को खोज कर प्रकाशित कराया ही साथ में हिन्दी शब्द सागर, संक्षिप्त शब्द सागर, अंग्रेजी हिंदी कोश, हिंदी वैज्ञानिक शब्दावली आदि का प्रकाशन जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य भी इस सभा ने किए। नागरी प्रचारिणी सभा ने नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का प्रकाशन लगातार करता रहा जो मूलतः शोध पत्रिका थी। सभा के पास अपना ‘आर्य भाषा पुस्तकालय भी था जिसमें प्राचीन अप्राप्य हस्तलिखित ग्रंथों का विशाल संग्रह था, वर्तमान समय में रख-रखाव और उपेक्षा से जर्जर हालत में विद्यमान है। हिंदी के प्रचार-प्रसार में इस साहित्यिक संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

2. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

हिंदी आंदोलन और प्रचार-प्रसार में सक्रिय रूप से भाग लेने वाली हिंदी-सेवी साहित्यिक संस्थाओं में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का सर्वोपरि स्थान है। सन् 1910 ई. में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की प्रबंध समिति की एक बैठक में बाबू श्याम सुंदर दास ने हिंदी तथा नागरी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए देश भर के साहित्यकारों का एक सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव रखा, जिसे सर्व सम्मति से पारित कर दिया गया था। और उसी वर्ष इस प्रस्ताव को व्यावहारिक रूप भी दिया गया, जिसके फलस्वरूप महामना मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रथम अधिवेशन काशी में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने सरकारी अदालतों में नागरी के प्रचार तथा हिंदी भाषा व साहित्य के व्यापक विकास के लिए कोष संग्रह की अपील किया। परिणाम स्वरूप कोष-संग्रह के लिए एक समिति की स्थापना भी की गई। धन राशि एकत्रित होते ही उसी वर्ष, प्रयाग (इलाहाबाद) में सम्मेलन की विधिवत स्थापना हुई।

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने सम्मेलन की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सम्मेलन से प्रारम्भ में प्रथमा, मध्यमा, (विशारद) तथा उत्तमा (साहित्यरत्न) तीन परीक्षाएं आयोजित होती थीं। देश के लाखों लोगों ने सम्मेलन की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर हिंदी का अध्ययन किया। अहिंदी भाषी क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थिओं ने इससे लाभ उठाया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग एक त्रैमासिक ‘सम्मलेन पत्रिका’ का प्रकाशन लगातार होता रहा। जिसमें मौलिक रचनाओं के साथ-साथ शोध पत्र भी प्रकाशित होते थे।

हिंदी साहित्य सम्मेलन के उद्देश्य

1. हिंदी साहित्य के सब अंगों की पुष्टि और उन्नति का प्रयत्न करना।

2. देशव्यापी व्यवहारों और कार्यों को सुलभ करने के लिए राष्ट्र लिपि देवनागरी और राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार बढ़ाने का प्रयास करना।

3. नागरी लिपि को मुद्रण-सुलभ और लेखन-सुलभ बनाने की दृष्टि से उसे अधिक विकसित करने का प्रयत्न करना।

4. हिंदी भाषा को अधिक सुगम, मनोरम, व्यापक और समृद्ध बनाने के लिए समय-समय पर उसके अभावों को पूरा करना और उसकी शैली और त्रुटियों के संशोधन का प्रयत्न करना।

5. हिंदी भाषी राज्यों में सरकारी विभागों, पाठशालाओं, कालेजों, विश्वविद्यालयों, म्युनिसिपैलिटियों और अन्य संस्थाओं, समाजों, जनसमूहों तथा व्यापार और अदालत के कार्यों में देवनागरी लिपि और हिंदी भाषा के प्रचार का उद्योग करते रहना।

6. हिंदी के ग्रंथकारों, लेखकों, कवियों, पत्र-सम्पादकों, प्रचारकों को समय-समय पर उत्साहित करने के लिए पारितोषिक, प्रशंसापत्र, पदक, उपाधि आदि से सम्मानित करना।

7. सारे देश के युवकों में हिंदी-अनुराग उत्पन्न करने और बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना।

8. हिंदी भाषा द्वारा परमोच्च शिक्षा देने के लिए विद्यापीठ स्थापित करना।

9. हिंदी भाषा द्वारा उच्च परीक्षाएं लेने का प्रबंध करने के लिए एक हिंदी विश्वविद्यालय स्थापित करना।

10. जहाँ आवश्यकता समझी जाये, वहाँ पाठशाला, समिति तथा पुस्तकालय स्थापति करने और कराने का उद्योग करना तथा इस प्रकार की वर्तमान संस्थाओं की सहायता करना।

11. हिंदी-साहित्य की वृद्धि के लिए उपयोगी पुस्तकें लिखवाना और प्रकाशित करना।

12. हिंदी की हस्तलिखित और प्राचीन सामग्री तथा हिंदी भाषा साहित्य के निर्माताओं के स्मृति-चिह्नों की खोज करना और हर तथा सभी प्रकाशित पुस्तकों के संग्रह और रक्षा के निमित्त सम्मेलन की ओर से एक वृहत् संग्रहालय की व्यवस्था करना।

13. हिंदी भाषा तथा साहित्य संबंधी अनुसंधान का प्रबन्ध करना।

14. उपर्युक्त उद्देश्यों की सिद्धि और सफलता के लिए जो अन्य उपाय आवश्यक और उपयुक्त समझे जाएं, उन्हें काम में लाना।[4]

3. दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास

दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में हिंदी का विरोध राजनितिक कारणों से था, अंत: 1918 ई. में इंदौर में महात्मा गाँधी की अध्यक्षता में हुए हिंदी साहित्य सम्मलेन में दक्षिण भारत प्रचार सभा का गठन किया गया। गाँधी जी अपील पर इंदौर के सेठ ‘हुकुम चंद’ तथा तत्कालीन नरेश महाराजा ‘यशवंत राव होलकर’ ने दस-दस हजार की धनराशि प्रदान किया।

मद्रास शहर की ‘इंडियन सर्विस लीग’ के सदस्यों ने गाँधी जी से एक हिंदी प्रचारक भेजने का आग्रह किया था। जिसके बाद गाँधी जी ने अपने पुत्र ‘देवदास गाँधी’ को पहला हिंदी प्रचारक बनाकर दक्षिण भारत भेजा। बाद में हरिहर शर्मा, स्वामी सत्यदेव, शिवराम शर्मा, हृषीकेश शर्मा, अवध नंदन, रामनंद शर्मा, नागेश्वर मिश्र आदि अनेक प्रचारक दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दिया। प्रारंभ में यह प्रचार-कार्य ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के द्वारा होता रहा। बाद में मद्रास में एक कार्यालय खोला गया जिसका नाम भी ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय, मद्रास’ रखा गया।

इस संस्था की स्थापना के पीछे दो कारण महत्वपूर्ण थे- पहला इसका गठन ईसाई मिशनरियों के प्रचार के जबाब में गठन हुआ था। दूसरा महात्मा गाँधी की इच्छा थी की दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार दक्षिण भारतीयों द्वारा हो। इसीलिए 1927 ई. में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय, मद्रास’ का नाम बदल कर ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास’ कर दिया गया। ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ के संस्थापकों में चक्रवर्ती राजा गोपालाचार्य का विशेष योगदान है।

सभा के द्वारा प्राथमिक, माध्यमा, राष्ट्रभाषा, प्रवेशिका, विशारद पूर्वार्द्ध, विशारद उत्तरार्द्ध, प्रवीण तथा हिंदी प्रचारक, हिंदी की ये आठ परीक्षाएं संचालित होती हैं। इनमें से पहली तीन प्रारंभिक एवं अंतिम पांच उच्च परीक्षाएं हैं। परीक्षाओं के आयोजन के आलावा सभा प्रमाणपत्र, वितरणोत्सव, प्रचारक-सम्मेलन, वाक् प्रतियोगिता लेखन स्पर्धाएं, नाट्याभिनय, हिंदी सप्ताह, हिंदी मेलों आदि का भी समय-समय पर आयोजन करती रहती है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से ‘हिंदी प्रचार समाचार’ तथा ‘दक्षिण भारत’ नाम की दो पत्रिका भी प्रकाशित होती हैं। इनमें से पहली मासिक तथा दूसरी द्विमासिक सांस्कृति पत्रिका हैं।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की चार शाखाएं त्रिचिनापल्ली, (तमिलनाडु), एरनाकुलम (केरल), धारवाड़ (कर्नाटक) और हैदराबाद (आंध्र) में स्थापित हैं। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार द्वारा भारत की एकता बनाए रखना था। इस सभा का प्रमुख कार्य- ‘प्रांतीय भाषाओँ के सहयोग से हिंदी भाषा का विकास करना, प्रांतों में प्रांतीय भाषाओं को व्यवहार में लाना, अंतरप्रांतीय और केंद्रीय कार्यों में हिंदी का प्रयोग कराने के लिए जनता में हिंदी का प्रचार करना तथा हिंदी के अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए अन्य आवश्यक प्रयत्न करना था।’ हिंदी भाषा को दक्षिण भारत में लोकप्रिय बनाने, उसका व्यापक प्रचार करने उसे जनता तक पहुंचाने का अधिकांश श्रेय इसी संस्था को है।

4. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा

1936 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन का 25 वां अधिवेशन नागपुर में डा. राजेन्द्र प्रसाद के सभापतित्व में हुआ। इस अधिवेशन में राष्ट्रभाषा के व्यापक प्रचार की दिशा में एक सक्रिय कदम उठाया गया। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के एक प्रस्ताव के अनुसार दक्षिणोत्तर अहिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी प्रचार के लिए एक ‘हिंदी प्रचार समिति’ संगठित की गई। इस समिति की प्रथम बैठक वर्धा (अगस्त 1936 ई.) में हुई थी। शिमला (सन् 1938 ई.) में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मेलन के 27 वें अखिल भारतीय अधिवेशन में काका कालेलकर के सुझाव पर ‘हिंदी प्रचार समिति’ का नाम बदल कर ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ रख दिया गया। इस समिति का केंद्रीय कार्यालय प्रारंभ से ही वर्धा में स्थापित है।

इस समिति का उद्देश्य दक्षिण भारत के अलावा अन्य अहिंदी भाषी प्रांतों में राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार-प्रसार तथा राष्ट्रीय भावना का निर्माण करना है। ‘एक हृदय हो भारत जननी’ समिति का मूलमंत्र रहा है। समिति द्वारा हिंदी प्रचार का कार्य भारतीय प्रदेशों के साथ-साथ विदेशों में भी होता रहा है। लंका, वर्मा, अफ्रीका, स्याम, जावा, समात्रा, मारीशस, अदन, सूडान तथा इंगलैंड आदि देशों में भी समिति के केंद्र हैं, जहां पर हिंदी विद्यालय, पुस्तकालय एवं परीक्षाओं के केंद्र आदि स्थापित हैं।
प्रारंभ में समिति ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ की परीक्षाएं चलाती रही। किंतु सन् 1938 से इसने अपनी परीक्षाएं प्रारंभ की हैं। समिति के द्वारा निम्नलिखित हिंदी परीक्षाएं ली जाती हैं: प्राथमिक, प्रारंभिक, प्रवेश, परिचय, राष्ट्रभाषा कोविद, राष्ट्रभाषा रत्न, राष्ट्रभाषा आचार्य, अध्यापन कोविद, आलेखन कोविद, अध्यापन विशारद, बात चीत, महाजनी प्रवेश तथा प्रांतीय भाषा परीक्षा। इन परीक्षाओं में राष्ट्रभाषा कोविद, राष्ट्रभाषा रत्न तथा राष्ट्रभाषा आचार्य उपाधि परीक्षाएं हैं।

इन साहित्य संस्थाओं के अतिरिक्त प्रयाग महिला विद्यापीठ, हिन्दी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद, हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयाग, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पूना,  हिंदी विद्यापीठ, बंबई, हिंदुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा, मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्, बंगलौर, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पूना, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, अखिल भारतीय हिंदी परिषद्, तथा साहित्य कादमी, नई दिल्ली तथा असम राष्ट्रभाषा, प्रचार समिति, गुवाहाटी आदि ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्वाधीनता के संदर्भ में अपनी भाषा का नारा देने वाली ये सभी संस्थाएं अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं। ‘स्वभाषा’ के लिए इन संस्थाओं द्वारा किया गया प्रयास स्तुत्य है। हिंदी के प्रचार-प्रसार के आलावा इन संस्थाओं की सबसे बड़ी देन यह है कि इनके द्वारा देश में ‘निज भाषा की उन्नति अहै सब उन्नति का मूल है’ तथा ‘पर-भाषा दासता की सबसे बड़ी निशानी है’ जैसी राष्ट्रीय भावना को अंकुरित, पल्लवित एवं पुष्पित होने का अवसर प्राप्त हुआ।


हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने भी सराहनीय योगदान किया। इनमें से प्रमुख पत्रिकाएं निम्नलिखित हैं-

पत्रिकाएं वर्ष (ई.) संपादक
उदन्त मार्तण्ड, कलकत्ता 1826 जुगल किशोर शुक्ल
प्रजामित्र, कलकत्ता 1834 -
प्रजा हितैषी, आगरा 1860 राजा लक्ष्मण सिंह
हरिश्चंद्र मैगजीन, बनारस 1873 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Iहिंदी प्रदीप, प्रयाग 1877 बालकृष्ण भट्ट
भारत मित्र, कलकत्ता 1878 रूद्र दत्त
कवि वचन सुधा, बनारस 1883 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
नागरी प्रचारिणी पत्रिका, बनारस 1896 वेणी प्रसाद
सरस्वती, काशी 1900 श्यामसुंदर दास
समालोचक, जयपुर 1902 चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'
इन्दु, काशी 1909 जयशंकर प्रसाद
मर्यादा, प्रयाग 1910 कृष्णकांत मालवीय
प्रताप, कानपुर 1913 गणेशशंकर विद्यार्थी
विशाल भारत, कलकत्ता 1928 बनारसी दास चतुर्वेदी
पंजाब केसरी, लाहौर 1929 -




[1] भारतेंदु हरिश्चंद- रामविलास शर्मा, पृष्ठ- 73
[2] खड़ी बोली का आंदोलन- पृष्ठ- 103
[3] राजभाषा के संदर्भ में हिंदी आंदोलन का इतिहास- उदय नारायण दूबे, पृष्ठ- 165
[4] राजभाषा के संदर्भ में हिंदी आंदोलन का इतिहास- उदय नारायण दूबे, पृष्ठ- 169


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