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महामारी और अकाल पर आधारित हिंदी साहित्य की प्रमुख रचनाएँ


कोरोना के बहाने तमाम साहित्यकारों और विद्वानों का ध्यान महामारी और अकाल की तरफ गया है। यह चर्चा-परिचर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। जाँच-पड़ताल चल रही है कि हिंदी साहित्य में महामारी और अकाल को लेकर साहित्य लिखा गया है या नहीं? जाहिर सी बात है कि अकाल और महामारी जैसे विषय पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में काफी साहित्यिक रचनाएं लिखी जा चुकी हैं। आजकल् भी काफी कुछ लिखा जा रहा है। उम्मीद है आने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में अकाल और महामारी संबंधी साहित्यिक रचनाओं से प्रश्न पूछे जाएँ।

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अकाल और महामारी पर भक्ति काल में कबीरदास और तुलसीदास जैसे कवियों के यहाँ काफी कुछ लिखा गया है। कबीर के यहाँ कहीं-कहीं जिक्र भर हुआ है लेकिन तुलसीदास ने इस पर काफी लिखा है। वहीं आधुनिक काल के आरम्भ में यह तंत्र-मंत्र तक सीमित हो जाता है। ‘चंद्रप्रभा जैसी पत्रिकाओं में मलेरिया-मंत्र भी मिलते हैं। भारतेंदु हैज़े से बचने के लिए जंतर पहनने को कारगर मानते थे। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘प्लेगस्तवराज’ की आरम्भिक और अंतिम पंक्तियाँ संस्कृत में लिखीं। बम्बई के प्रसिद्ध डाक्टर गोपीनाथ कृष्णजी की दवाईओं का एक विज्ञापन देखने से पता चलता है कि उनके पास बुखार, बवासीर, सुज़ाक, सफ़ेद कोढ़, हैज़े की दवाइयां उपलब्ध हैं लेकिन प्लेग-मलेरिया की नहीं।’ (अबलाहितकारक, मार्च 1902, अंक 11, वर्ष 1)

लेकिन आगे चलकर बहुत सारी रचनाएँ प्रकाश में आईं जिनमें महामारी और अकाल पर विस्तार के साथ उन कारणों की जाँच-पड़ताल भी की गई है। महामारी और अकाल विषयवस्तु को लेकर लगभग साहित्य की हर विधाओं में लिखा गया है। आइए इस विषयवस्तु से संबंधित प्रमुख रचनाओं को क्रमवार देखते हैं-

A) काव्य

1. तुलसीदास- कवितावली

तुलसीदास ने अकाल के कारण होने वाले दुखों और कष्टों का अपने साहित्य में मार्मिक वर्णन किया है। कवितावली में भीषण अकाल और दरिद्रता का चित्रण अधिक मिलता है। अन्य रचनाओं की अपेक्षा कवितावली का वर्णन अपेक्षाकृत अधिक यथार्थपरक, वास्तविक और मार्मिक है। अपने समय का हाहाकार, दैन्य, निराशा, अकाल, भुखमरी का चित्रण जिस मार्मिकता से तुलसीदास ने किया है, वह मुग़ल कालीन वैभव व सम्पन्नता पर प्रश्नचिंह खड़ा करता है। तुलसीदास के समय अकबर का शासन काल था। इस दौरान पांच बार भीषण अकाल पड़ा था।

2. केदारनाथ अग्रवाल- अकाल से लड़ता कमासिन (1967) और बंगाल का अकाल

अकाल से लड़ता कमासिन कविता में केदार ने अपने गाँव कमासिन के अकाल का वर्णन किया है, जहाँ पर उनका जन्म हुआ था-

‘अकाल से लड़ रहा है
मेरा गाँव
कमासिन’

बंगाल का अकाल केदारनाथ अग्रवाल की अकाल पर दूसरी कविता है। उन्होंने इस कविता में गरीबी, लाचारी, भूखमरी का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। अकाल जैसी समस्या उत्पन्न होने पर चारों तरफ जो भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाती है उसके वर्णन में कवि का प्रगतिवादी स्वर उभर कर सामने आया है-

‘बाप बेटा बेचता है, भूख से बेहाल होकर।
धर्म, धीरज, प्राण खोकर
हो रही अनरीति बर्बर, राष्ट्र सारा देखता है।
बाप बेटा बेचता है।’

3. नागार्जुन- प्रेत का बयान

नागार्जुन ने ‘प्रेत का बयान’ कविता में भूखमरी के शिकार मृत्यु को प्राप्त दशा का यथार्थ चित्रण किया है-

‘ओ रे प्रेत
कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज
सच-सच बतला
कैसे मरा तू
भूख से, अकाल से,
बुखार, कालाजार से’

4. केदारनाथ सिंह- अकाल में दूब, अकाल में सारस (1988)

अकाल में दूब कविता में केदारनाथ सिंह ने अकाल के भयानक त्रासदी का चित्रण किया है और यह भी दिखाया है की मनुष्य के इत्तर जीवों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। कविता की कुछ पंक्तियाँ-

‘भयानक सूखा है
पक्षी छोड़कर चले गए हैं
पेड़ों को
बिलों को छोड़कर चले गए हैं चींटे
चींटियाँ
देहरी और चौखट
पता नहीं कहाँ-किधर चले गए हैं
घरों को छोड़कर’

अकाल में सारस केदारनाथ सिंह की एक और कविता है जिसमें अकाल के बाद की स्थितियों का वर्णन किया गया है। इसी नाम से उनका कविता–संग्रह भी है जिसके लिये उन्हें सन् 1989 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

B) उपन्यास

1. जयशंकर प्रसाद- कंकाल (1930 ई.)

जयशंकर प्रसाद जी के उपन्यास कंकाल में अकाल‌ का जिक्र हुआ है। मूलतः इस उपन्यास में प्रसाद जी ने अपने मूल प्रकृति के विपरीत आदर्श और नैतिकता के बजाय यथार्थ के धरातल पर आ कर भारतीय समाज के खोखलेपन को उजागर किया है। कंकाल समाज की रूढ़िग्रत धार्मिकता तथा थोथी नैतिकता पर बडा गहरा व्यंग्य है। ऊपरी सामाजिक व्यवस्था के भीतर कितना भंयकर खोखलापन है, इसे ‘प्रसाद’ ने प्रत्यक्ष कर दिया है।

2. अमृत लाल नागर- महाकाल-1947 ई. (1970 से ‘भूख’ शीर्षक प्रकाशित)

नागर जी का यह उपन्यास बंगाल के अकाल पर आधारित है, उन्होंने इस उपन्यास में बंगाल के अकाल का सजीव चित्रण किया है। उपन्यास की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि, ‘सन् ’43 के बंग-दुर्भिक्ष में मनुष्य के चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य आँखों देखे गये हैं। कलकत्ते की सड़कों के फुटपाथ ऐसी बीभत्स करूणा से भरे थे कि देख-देखकर जी उमड़ता था....द्वितीय महायुद्ध में गला फँसाए हुए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों से भरे अफसर-व्यापारियों के षडंयंत्र के कारण ही हजारों लोग भूखों तड़प-तपड़कर मर गए, सैकड़ों गृहणियाँ वेश्याएँ बनाई जाने के लिए और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गए।’ इस उपन्यास में बंगाल के अकाल से संबंधित सारे पहलू अंकित है।

3. रांगेय राघव- विषाद मठ (1946 ई.)

रांगेय राघव का यह उपन्यास भी बंगाल के अकाल को विषयवस्तु बनाकर लिखा गया है। उपन्यास की भूमिका में इस उपन्यास के रांगेय राघव ने लिखा है कि, ‘जब मुगलों का राज्य समाप्त होने को आया था तब बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा था। उस पर बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘आनंद मठ’ लिखा था। जब अँग्रेजों का राज्य समाप्त होने पर आया तब फिर बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा। उसका वर्णन करते हुए मैंने इसलिए इस पुस्तक को विषाद मठ नाम दिया।’

प्रस्तुत उपन्यास तत्कालीन जनता का सच्चा इतिहास है। इसमें एक भी अत्युक्ति नहीं, कहीं भी ज़बर्दस्ती अकाल की भीषणता को गढ़ने के लिए कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है।

4. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला- अलका (1933 ई.) और कुल्लीभाट (1939ई.)

निराला की दो ऐसी औपन्यासिक कृतियां हैं जिनमें 1918 में अवध में पड़े आकल के बाद फैली महामारी का चित्रण है।

अलका उपन्यास में निराला ने अवध क्षेत्र के किसानों और जनसाधारण के अभावग्रस्त और दयनीय जीवन का चित्रण किया है। पृष्ठभूमि में स्वाधीनता आंदोलन का वह चरण है जब पहले विश्वयुद्ध के बाद गांधीजी ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली थी। यही समय था जब शिक्षित और संपन्न समाज के अनेक लोग आंदोलन में कूदे जिनमें वकील-बैरिस्टर और पूंजीपति तबके के नेता मुख्य रूप से शामिल थे। इन लोगों की प्रतिबद्धता स्वतंत्रता आंदोलन से बेशक गहरी रही, लेकिन किसानों और मजदूरों की तकलीफों से इनका ज्यादा वास्ता नहीं था। इनका मुख्य उद्देश्य अपने लिए आजादी हासिल करना था, इसलिए नेतृत्व का एक हिस्सा किसानों-मज़दूरों के आंदोलन को उभरने देने के पक्ष में नहीं था। निराला ने इस उपन्यास में वर्गीय दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। जमींदारों के विरुद्ध किसानों के विद्रोह का जैसा अंकन यहाँ हुआ है वह अपनी यथार्थवादिता के नाते दुर्लभ है। इस उपन्यास में उनकी भाषा भी पहले उपन्यास ‘अप्सरा’ से ज्यादा वयस्क है।

कुल्लीभाट उपन्यास में निराला जी नें प्लेग और बंगाल के अकाल का काफी मार्मिक चित्रण है। बंगाल प्रवास के दौरान उन्हें तार आया कि पत्नी सख्त बीमार हैं। निराला नहीं आते है और कई वर्ष बाद जब ससुराल जाते हैं तो पता चलता है कि पत्नी का देहांत हो चुका होता है। प्लेग के कारण उनकी पत्नी की असमय मृत्यु हो गई। इस प्रकरण के वर्णन में निराला ने प्लेग की भयंकरता का बहुत ही मार्मिक दृश्य प्रस्तुत किया है। दुखी होकर निराला कोलकता वापस चले जाते हैं। उन्होंने लिखा की ‘स्त्री का प्यार उसी समय मालूम दिया जब वह स्त्रीत्व छोड़ने को थी।’
अपनी कथावस्तु और शैल-शिल्प के नएपन के कारण न केवल निराला के गद्य-साहित्य की बल्कि हिंदी के संपूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्माकथा ही है। इस उपन्यास में निराला के विद्रोही तेवर और गलत सामाजिक मान्याताओं पर उनके तीखे प्रहारों को देखने को मिलता है।

कुल्ली भाट निराला का आत्माकथात्मक उपन्यास है। प्रारंभ में ही उन्होंने ने स्पष्ट कर दिया है कि हास्य इस उपन्यास का प्रधान तत्व है। उपन्यास का नायक कुल्ली भाट समलैंगित प्रकृत्ति का है।

5. केशव प्रसाद मिश्र- कोहबर की शर्त (1965 ई.)

कोहबर की शर्त केशव प्रसाद मिश्र का बेहतरीन उपन्यास है। जिस पर ‘नदिया के पार’ और हम ‘आपके है कौन’ फिल्म भी बनी है। इस उपन्यास में महामारी की समस्या का विषद वर्णन किया गया है। कोहबर की शर्त एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो गाँवों-बलिहार और चौबेछपरा-का जनजीवन गहन संवेदना और आत्मीयता के साथ चित्रित हुआ है, इसके नायक-नायिका चन्दन और गुंजा हैं।

तिनका-तिनका जोड़ कर बनाया गया घर महामारी में कैसे उजड़ जाता है यह उपन्यास में बखूबी दिखाया गया है। ग्रामीण परिवेश में अभाव की जिंदगी और संबंधों की प्रगाढ़ता इस उपन्यास को भावुक जरूर बना देती है पर यथार्थ की भावभूमि से लेखक कहीं भी टसमस नहीं हुआ है। अपने छोटे कलेवर में ग्रामीण जीवन के भाव-अभाव का इतना बेहतरीन चित्रण शायद ही किसी अन्य लेखक के यहाँ देखने को मिले।

6. राही मासूम रज़ा- आधा गांव (1966 ई.)

राही मासूम रज़ा के आधा गांव उपन्यास में चेचक से ग्रस्त मुमताज का जिक्र है। आधा गाँव 1947 के काल परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है।  स्वाभाविक है कि उस कालखण्ड की सामाजिक, राजनैतिक चेतना उभरकर इस उपन्यास में आयी है। शिया मुसलमानों पर केंद्रित  उपन्यास स्वाधीनता आंदोलन तथा देश विभाजन का ऐतिहासिक साक्ष्य है। मूलतः यह एक आंचलिक उपन्यास है। जो उत्तर प्रदेश के गंगोली गाँव (जिला- गाजीपुर) के भौगोलिक सीमा के इर्द गिर्द बुना गया है।

7. नरेश मेहता- उत्तरकथा: दो खंडों में प्रकाशित (1979 ई., 1982 ई.)

नरेश मेहता जी के उपन्यास उत्तरकथा (प्रथम खंड) में मालवा के हैजे का हृदयद्रावक चित्रण है। इस उपन्यास के प्रमुख पात्र शिवशंकर, आचार्य, त्रयम्बक और दुर्गा है।

8. कमलाकांत त्रिपाठी- पाहीघर (1991 ई.)

कमलाकांत त्रिपाठी के पाहीघर उपन्यास में हैजा से हुई मौतों का उल्लेख आया है। कमलाकांत त्रिपाठी ने अपने उपन्यास ‘पाहीघर’ में 1857 के विद्रोह के ऐतिहासिकता को आधार बनाकर समकालीन जीवन को वाणी दी है। इस उपन्यास में जमींदारी व्यवस्था के यथार्थ स्वरूप को रेखांकित किया गया है।

9. प्रतिभा राय- मग्नमाटी (1999 ई.)

1999 में ओड़िशा में एक ऐसा भयंकर साइक्लोन आया जो उत्तरी हिन्द महासागर में अभी तक का सबसे विनाशकारी साइक्लोन था। समुद्र का पानी तट को पार कर 35 किलोमीटर अन्दर तक पहुँच कर जगतसिंहपुर जिले के तमाम गाँवों को तहस-नहस कर गया और अनुमान है कि 50,000 लोगों की इसमें जान गयी।

सन् 1999 के महाचक्रवात पर आधारित उनके उपन्यास ‘मग्नमाटी’ (पुनर्जीवनदात धरती) को, जो व्यक्ति और उसकी सभ्यता पर इस चक्रवात के रूपातंरकारी प्रभाव पर लिखा गया है, उनकी महानतम कृति माना जाता है।

प्रतिभा राय 1991 में मूर्तिदेवी पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला थीं। उन्हें वर्ष 2011 के लिए 47वां भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है।

10. प्रभा खेतान- पीली आँधी (2001 ई.)

पीली आंधी उपन्यास मारवाड़ी समाज के अनछुए पहलू पाठक के सामने पर्त-दर-पर्त खोलता है। इसमें मारवाड़ की सामंतीय व्यवस्था के उत्पीड़न और अकाल से त्रस्त मारवाड़ी समाज के कलकत्ता आने और अनेक अवरोधों-विरोधों का वर्णन किया गया है। मूल रूप से यह उपन्यास परिवारिकता की धुरी विवाह नामक संस्था को कटघरे में खड़ा करता है।

प्रभाखेतन ने उपन्यास की भूमिका में लिखा है कि, ‘यह न आत्मकथा है और न परकथा। इस उपन्यास में कोई एक परिवार नहीं, इसमें कुल हैं, कबीला है...संयुक्त परिवार है....मगर सब कुछ टूटता हुआ, उड़ती हुई रेत के ढूहें जैसे स्त्री-पुरुष और उनकी किरकिराती हुयी रेतीले क्षण। तीन पीढ़ियों की स्त्रियां; चाची, बड़ी मां और सोमा, अपनी-अपनी बात कहते हुए भी खामोशी की धुन्ध में खोती हुई। मगर एक चीज जो सब को जिन्दा रखती है-वह है प्रेम। चाहे वह राजस्थान की सुनहली रेत हो या बंगाल की हरित्तमा-यह प्रेम ही तो है जो हम सब की पहचान है।’

इस उपन्यास पर विडला फाउंडेशन द्वारा बिहारी पुरस्कार भी प्रदान किया गया

11. शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय- गृहदाह (1919 ई.)
शरतचन्द्र के गृहदाह उपन्यास में भी नोखा (बिहार) के इलाके में प्लेग महामारी का जिक्र है। पीड़ितों का इलाज करते हुए नायक महिम की मौत भी हो जाती है। यह उपन्यास का अंतिम अध्याय भी है। महिम, सुरेश और अचला प्रमुख पात्र हैं, त्रिकोणीय प्रेम की कहानी है।

C) कहानी

1. मास्टर भगवानदास- प्लेग की चुड़ैल (1902 ई.)

मास्टर भगवानदास की कहानी ‘प्लेग की चुड़ैल’ 1902 ई. में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी में भी महामारी और उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है। कहानी का आरंभ ही महामारी से होता है। कहानीकार के शब्दों में, ‘गत वर्ष जब प्रयाग में प्‍लेग घुसा और प्रतिदिन सैकड़ों गरीब और अनेक महाजन, जमींदार, वकील, मुख्‍तार के घरों के प्राणी मरने लगे तो लोग घर छोड़कर भागने लगे।’ ठाकुर वैभव सिंह की पत्नी को प्लेग रोग से मरी समझ कर उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है, लेकिन वह बच जाती है।

2. पांडेय बेचन शर्मा उग्र- वीभत्स

कहानी से- ‘सन् 17 की बात है। देश के अधिकांश भागों में युद्ध-ज्‍वर या इंफ्ल्‍युएंजा का नाशकारी आतंक छाया हुआ था। एक-एक शहर में रोज शत-शत प्राणी मर रहे थे। एक-एक गाँव में अनेक-अनेक। अनूपशहर और उसके आस-पास के हाट-बाजारों में कुहराम-सा छाया था। खास सुमेरा के गाँव के सभी प्राणी त्रस्‍त थे। मारे डर के कोई बाजार नहीं जाता था, क्‍योंकि लोगों ने सुन रखा था कि वह रोग छूत से भी फैलता है।’

प्रमुख पात्र सुमेरा और उसका बेटा शमशेरा, शमशेरा की पत्नी, लैला बकरी है। महामारी की वजह से वीभत्स कहानी का प्रमुख नायक सुमेरा भी अंत में मर जाता है।

3. फणीश्वरनाथ रेणु- पहलवान की ढोलक

रेणु की दूसरी कहानी ‘पहलवान की ढोलक’ 11 दिसम्बर, 1944 को ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ में प्रकाशित हुई थी। यह महामारी के ऊपर अत्यंत मार्मिक कहानी है। कहानी की शुरुआत ही मलेरिया और हैजे से पीड़ित गांव से होती है। पहलवान की ढोलक, व्यवस्था के बदलने के साथ लोक कलाकार के अप्रासंगिक हो जाने की कहानी है। इस कहानी में लुट्टन नाम के पहलवान की हिम्मत और जिजीविषा का वर्णन किया गया है। व्यवस्था का कला के प्रति अनादर, भूख और महामारी, अजेय लुट्टन की पहलवानी को फ़टे ढोल में बदल देते हैं।

‘पहलवान-की ढोलक’ पाठ में लुट्टन एक प्रमुख पात्र है। वह ऐसा केंद्र बिंदु है जिसके इर्द-गिर्द समस्त कथाचक्र घूमता है। ढोल लुट्टन को प्रेरणा स्रोत लगता है। यही कारण है कि लुट्टन अपने बेटों को भी पहलवानी सिखाते समय ढोल बजाता है ताकि उसी की भांति वे भी ढोल से प्रेरणा लें। गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल इसलिये बजाता रहा, क्योंकि गाँव में निराशाजनक माहौल बन गया था तथा मौतों के कारण डरावना सन्नाटा छा गया था। उसकी ढोल की आवाज़ लोगों में जीवन का संचार करती है।

4. धर्मवीर भारती- मुर्दों का गांव

धर्मवीर भारती के कथा संग्रह का नाम भी इसी कहानी पर मुर्दों का गांव है, यह संग्रह 1946 में प्रकाशित हुआ था। ये वो दौर था जब बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा था और अंग्रेजी सरकार वेलफेयर स्टेट होने का ढोंग करती हुई लोगों को मरने के लिए छोड़ चुकी थी। इस कहानी में शुरुआत भुतहा तरीके से होती है, लेकिन कुछ देर बाद पता चल जाता है कि ये भूख से मर रहे लोगों की कहानियां हैं।

5. राजिंदर सिंह बेदी- क्वारनटीन

उर्दू के कथाकार राजिंदर सिंह बेदी की कहानी क्वारनटीन अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखी गयी है। कथाकार ने लिखा है कि, ‘प्लेग तो खतरनाक थी ही, मगर क्वारनटीन उससे भी ज्यादा खौफनाक थी। लोग प्लेग से उतने परेशान नहीं थे जितने क्वारनटीन से।’

6. प्रेमचन्द ने भी प्लेग महामारी पर एक कहानी लिखी है। उनकी कुछ कहानियों में चेचक, हैजा महामारी से उजड़ते परिवार का भी जिक्र है।

D) अन्य विधाएं

1. बनारसी दास जैन- अर्धकथानक (आत्मकथा- 1641)

अर्धकथानक आत्मकथा ब्रजभाषा में है। यह दोहा छंद में लिखी हिंदी की प्रथम आत्मकथा है। या यूँ कहें कि यह किसी भारतीय भाषा में लिखी हुई प्रथम आत्मकथा है।

अर्धकथानक आत्मकथा में महामारी विशद वर्णन और उसके प्रभाव का चित्रण हुआ है। जब ख़ुद बनारसीदास इसके शिकार हो जाते हैं, तब उनको छूना और उनके पास जाना तक मना हो जाता है। तब किसी ने अपनी परवाह न करके मनुष्य धर्म का निर्वाह करते हुए बनारसी दास की देखभाल करते हुए जिलाया था।

2. हरिशंकर परसाई- गर्दिश के दिन (संस्मरण)

परसाई के गर्दिश के दिन में भी महामारी का खौफनाक चित्रण किया गया है। उन्होंने अपने इस संस्मरण में लिखा है कि, ‘बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। 1936 या 1937 होगा। मैं शायद आठवीं का छात्र था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में टपरे बनाकर रहने चली गई थी। हम नहीं गए थे। मां सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। भांय-भांय करते पूरे आसपास में हमारे घर ही चहल-पहल थी। काली रातें. इनमें हमारे घर जलने वाले हमारे कंदील. मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़कर चले गए थे, रात के सन्नाटे में हमारी आवाजें हमें ही डरावनी लगती थीं। रात को मरणासन्न मां के सामने हम लोग आरती गाते।’

हरिशंकर परसाई ने ‘गर्दिश के दिन’ शीर्षक से लिखे गए संस्मरण में अपने बचपन की त्रासदियों का जिक्र करते हुए बताया है कि वे लेखक कैसे बने।

3. रांगेय राघव- तूफ़ानों के बीच (रिपोर्ताज- 1946 ई.)

तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का मार्मिक रिपोर्ताज है। अपनी विशिष्ट वर्णन शैली और व्यापक मानवीय सरोकारों के चलते यह रचना अत्यन्त हृदयग्राही सिद्ध हुई है। रांगेय राघव ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपेट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने गुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकी जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है। आगरे के सैकड़ों मनुष्यों ने दान नहीं, अपना कर्तव्य समझकर एक मेडिकल जत्था बंगाल भेजा था। जनता के इन प्रतिनिधियों को बंगाल की जनता ने ही नहीं, वरन् मंत्रिमंडल के सदस्यों तक ने धन्यवाद दिया था। किन्तु मैं जनता से स्फूर्ति पाकर यह सब लिख सका हूँ। मैंने यह सब आँखों-देखा लिखा है।’

4. प्रकाशचंद्र गुप्त- बंगाल का अकाल (रिपोर्ताज)

प्रकाश चंद्र गुप्त का यह रिपोर्ताज नाम से ही लग रहा है की बंगाल के अकाल पर आधारित है। इसमें अकाल और उससे उपजे विभीषिका का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह बंगाल के अकाल की महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग में गिनी जाती है। हिंदी साहित्य में अधिकतर रिपोर्ताज युद्ध, अकाल, बाढ़ जैसी घटनाओं पर लिखे गये हैं।

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