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राजा निरबंसिया कहानी की समीक्षा एवं सारांश | कमलेश्वर

राजा निरबंसिया कहानी और कमलेश्वर का परिचय

कमलेश्वर नयी कहानी आंदोलन के स्थापकों में रहे, जिसे नयी कहानी त्रयी कहा जाता है। कमलेश्वर के अलावा राजेंद्र यादव और मोहन राकेश इस त्रयी में आते हैं। कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं हैं जिसमें से अधिकतर ‘समग्र कहानियाँ’ में संग्रहित हैं। प्रारम्भिक दौर के कहानी संग्रहों में ‘राजा निरबंसिया’ (1957 ई.) और ‘कस्बे का आदमी’ (1957 ई.) आते हैं। जिसमें कस्बाई जीवन से संबंधित कहानियाँ संग्रहीत है। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ निम्नलिखित हैं- राजा निरबंसिया, मांस का दरिया, नीली झील, तलाश, बयान, ज़िंदा मुर्दे, जॉर्ज पंचम की नाक, मुर्दों की दुनिया, कस्बे का आदमी आदि।

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कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में ‘परंपरा से विद्रोह और अनुभव-क्षेत्र की प्रमाणिकता पहचान’  पर जोर दिया है। वे जीवन-संघर्ष के जिन अनुभवों से होकर गुजरे थे, उन्हीं स्थितियों पर कहानी लिखी है। यही वजह है कि उनकी कहानियों में पात्र नहीं स्थितियाँ प्रधान है। उन्होंने लिखा भी है “मैंने कभी भी अपनी रचना को किसी व्यक्ति पर आधारित नहीं किया... वह हमेशा ही स्थितियों पर आधारित रही है और अधिकांश में कई व्यक्तियों के सम्मुच्चय से मेरे पात्रों ने जीवन धारण किया है।”[1]

नयी कहानी को स्थापित करने में कमलेश्वर की महत्वपूर्ण भूमिका रही उन्होंने न केवल रचनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखीं अपितु आलोचना के स्तर पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया। ‘नयी कहानी की भूमिका उनकी नयी कहानी संबंधी आलोचनात्मक ग्रंथ है, जिसमें नयी कहानी संबंधी महत्वपूर्ण बहसें हैं।

“नई कहानी’ की अस्मिता को स्थापित करने और बचाने की जद्दोजहद में, राकेश, यादव के साथ जिस व्यक्ति ने लगातार खड्गहस्त होकर लड़ाई लड़ी वह कमलेश्वर ही हो सकता था। जो लोग नई कहानी की इलाहाबादी त्रयी के पीछे चले जाने की बात करते हैं वे यह तथ्य भूल जाते हैं कि ‘नई कहानी’ को विचारधारात्मक एवं आलोचनात्मक अस्त्र मुहैया करने वालों में कमलेश्वर, यादव, राकेश की त्रयी आगे थी। कमलेश्वर, शायद इस त्रयी में अगले सफों में लगने वाले रहे।”[2]

कमलेश्वर ने ‘नयी कहानी’ आलोचना में ‘अनुभव की प्रमाणिकता’ को जोरदार तरीके से स्थापित किया। उन्होंने लिखा भी है कि, “नई कहानी में प्रामाणिकता- यानी ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ की बात यूँ नहीं उठी थी। साहित्य का संस्कार तो मुझे इलाहाबाद से ही मिला था। यह भी सही है कि ‘देवा की माँ’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘गरमियों के दिन’, ‘कस्बे का आदमी’ आदि कहानियाँ इलाहाबाद में ही लिखी थीं। पर इनकी मनोरचना मैनपुरी में ही हुई थी।” कस्बे की जिन्दगी को वे इस दौर में न केवल जी रहे थे अपितु उसे समग्र रूप में कहानियों में आत्मसात करने की भी कोशिश कर रहे थे।

कमलेश्वर के यहाँ दाम्पत्य सम्बन्धों के असंतोष और बिखराव का ही चित्रण अधिक हुआ है। देवा की माँ’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘बयान’, ‘आत्मा की आवाज’, ‘तीन दिन पहले की रातआदि कहानियाँ इसके उदाहरण हैं। कस्बे की संस्कृति भी इस कहानी में स्पष्ट रूप से आई है।

सुधीश पचौरी के शब्दों में “कमलेश्वर पुरानेपन के इसी मर्म प्रदेश पर प्रहार करते हैं जो स्त्री को अपने त्याग, तपस्या और भोग की देवदासी बनाए रखना चाहता था।”[3] उन्होंने आगे लिखा कि कमलेश्वर ने पुरानी कहानी की स्त्रीकी टाइपोलोजीको सटीक ढंग से पकड़ा है और उसकी व्यर्थता को सिद्ध किया है। अपने आलोचना एवं समीक्षा के साथ-साथ कहानियों में भी।

राजा निरबंसिया कहानी के प्रमुख पात्र

जगपती- चन्दा का पति  

चन्दा- जगपती की पत्नी

दयाराम- जगपती का रिश्तेदार (दूर रिश्ते का भाई)

बचनसिंह- कस्बे के अस्पताल का कम्पाउण्डर

राजा निरबंसिया और उसकी रानी

भटियारिन- राजा निरबंसिया की रानी ही भटियारिन बनकर राजा निरबंसिया से मिलने जाती है

राजा निरबंसिया कहानी का सारांश

‘राजा निरबसिया’ कहानी कस्बाई जीवन पर आधारित है, जो आम आदमी की ही कथा कहती है। कमलेश्वर ने दो भिन्न युगों की कहानियों को निरबंसिया कहानी आर्थिक विवशताओं, निरुपताओं द्वारा दांपत्य सम्बन्धों की समान्तर रूप से इस कहानी में रख दिया है। एक ही समय में पुराने तथा आधुनिक युग की दो कहानियाँ साथ चलती है। प्रथम कहानी लोक कहानी है, जो आम आदमी की नहीं बल्कि राजा और रानी की कहानी है। लेकिन यह कहानी कभी भी नहीं लगता कि दूसरी कहानी के ऊपर बोझिल हो रही है। बल्कि सहायक कहानी के रूप में आती है। सम्पूर्ण कहानी आधुनिक नायक जगपती और चंदा की व्यथा का ही वर्णन करती है।

“राजा निरबसिया’ कहानी आर्थिक विवशताओं, निरुपताओं द्वारा दांपत्य सम्बन्धों की मधुरिमा के कड़वाहट में बदलने, उन संबंधों के तिड़कने और टूटने की बेबी तथा संतानहीना दंपति की सामाजिक स्थिति और मानसिक पीड़ा, उस पीड़ाशमन के निमित्ति पुत्र प्राप्ति की ललक, आदि का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें जगपती और चंदा का संघर्ष है। जहाँ जगपती का बाह्य तथा आंतरिक जीवन का संघर्ष है वहीं चंदा का पत्नी और स्त्री होने का संघर्ष है। जगपती मूल्यहीनता से ग्रसित आम आदमी है, वह सुख के लिए किसी भी मूल्य को त्यागने को तैयार है।[4]

इस कहानी में एक लोककथा के माध्यम से एक आधुनिक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कहानी कही गई है।

‘राजा निरबंसिया’ कहानी में दाम्पत्य जीवन के बिखराव के अलावा आर्थिक स्तर पर मध्यवर्गीय परिवार का लाचारगी भी दिखती है। जिससे जगपती आत्महत्या कर लेता है। अर्थ मानव के रिस्तों को जोड़ता भी है और तोड़ता भी है। अगर ‘अर्थ’ होता तो न बच्चन सिंह का अवरोध आता, न समाज चंदा पर उंगली उठाने की हिम्मत करता। कमलेश्वर उस पुराण कथा के द्वारा यह बताने की कोशिश करते हैं कि जिसके पास पैसा है, समाज में मान-सम्मान, इज्जत-आबरू उसी के पास होती है।

‘राजा निरबसिया’ कहानी दो व्यक्तियों की कहानी सी प्रतीत होती है। क्या वह दो व्यक्तियों की कहानी है? उन्होंने लिखा भी है कि यदि मेरी कहानी पात्रों सक सीमित है, तो वह उसकी कमजोरी ही समझी जाएगी। यह कहानी दो पात्रों सक न सिमटकर गतिशील जीवन के कई उतार चढ़ावों को एक साथ व्यजित करता है। इसमें जगपती और चंदा का अपना-अपना संघर्ष है। बच्चन सिंह जैसा व्यक्तित्व है। साथ में एक लोक कथा भी है। जिसके प्रत्येक प्रस्तुति के बाद चंदा और जगपती की कथा एक भीषण सामाजिक समस्या बन कर सामने आती है। “पर उसी दिन जगपती अपना सारा कारोबार त्याग अफीम और तेल पीकर मर गया, क्योंकि चंदा के पास कोई दैवी शक्ति नहीं थी और जगपती राजा नहीं, बचन सिंह कपाउंडर का कर्जदार था।”[5] वह जीने की भरपूर इच्छा रखते हुए भी आत्म हत्या के लिए विवश था। कमलेश्वर जीवन की इसी समग्रता को यथा सम्भव रूपायित करने के प्रयास में संलग्न रहे।

पति-पत्नि संबंधों और कस्बाई संस्कृति के लिहाज से ‘राजा निरबंसिया’ महत्वपूर्ण कहानी है। ‘नयी कहानी’ के अनुरूप स्त्री-पुरुष संबंधों में आये बदलाव की समाजशास्त्रीय चिंता इस कहानी में व्यक्त की गई है। यह दो समानांतर ध्रुवों की कहानी है। इसमें पारंपरिक लोक-शिल्प के समांतर वर्तमान जीवन की विसंगति-बोध को कलात्मकता के साथ चित्रित किया गया है।

राजा निरबंसिया कहानी के प्रमुख कथन

कहानी की शुरुआत ही होती है- “एक राजा निरबंसिया थे,” मां कहानी सुनाया करती थीं।

दयाराम के घर जब डाका पड़ा तब जगपती ने हिम्मत बढाते हुए हांक लगाई, “ये हवाई बन्दूकें इन ठेल-पिलाई लाठियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगी, जवानो।”

एक दिन जब बचनसिंह जगपती के घाव की पट्टी बदलने आया-  उसके आने में और पट्टी खोलने में कुछ ऐसी लापरवाही थी, जैसे गलत बंधी पगडी क़ो ठीक से बांधने के लिए खोल रहा हो।

जगपती- “देखो चन्दा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं। हमारी औकात इन दवाइयों की नहीं है।

चन्दा- “औकात आदमी की देखी जाती है कि पैसे की”

जगपती- “तुम नहीं जानतीं, कर्ज क़ोढ क़ा रोग होता है, एक बार लगने से तन तो गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है।”

चन्दा- “ये दवाइयां किसी की मेहरबानी नहीं हैं। मैंने हाथ का कडा बेचने को दे दिया था, उसी में आई हैं।”

जगपती की चाची- “राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए क़ुलमा भी आई हैं।”

जगपती ने चन्दा से कहा- “तुम्हारे कभी कुछ नहीं होगा।”

जगपती- एक स्त्री से यदि पत्नीत्व और मातृत्व छीन लिया गया, तो उसके जीवन की सार्थकता ही क्या?

मेहतरानी- हाय राम! आज राजा निरबंसिया का मुंह देखा है, न जाने रोटी भी नसीब होगी कि नहीं न जाने कौन-सी विपत टूट पडे!

चाची- आ गए सत्यानासी! कुलबोरन!”

जगपती- औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीडा।

शकूरे- “हरा होने से क्या, उखट तो गया है।”

जगपती- वह स्वयं भी तो एक उखड़ा हुआ पेड़ है, न फल का, न फूल का, सब व्यर्थ ही तो है। जो कुछ सोचा, उस पर कभी विश्वास न कर पाया।

-उस घर में नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ ज़बान हिलाकर शासन करनेवाले होते हैं। वह उस घर में भी नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ माँगकर जीनेवाले होते हैं। वह उस घर का है, जो सिर्फ़ काम करना जानता है, काम ही जिसकी आस है। सिर्फ़ वह काम चाहता है, काम।

-बचन सिंह सिहर-सा गया और उसके हाथों को उसके हाथों को अभ्यस्त निठुराई को जैसे किसी मानवीय कोमलता ने धीरे-से छू लिया।

-पर उसी रात जगपती अपना सारा कारोबार त्याग, अफीम और तेल पीकर मर गया क्योंकि चन्दा के पास कोई दैवी शक्ति नहीं थी और जगपती राजा नहीं, बचनसिंह कम्पाउण्डर का कर्जदार था। 

-जगपती ने मरते वक्त दो परचे छोडे, एक चन्दा के नाम, दूसरा कानून के नाम।

जगपती- चन्दा को उसने लिखा था, “चन्दा, मेरी अन्तिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर चली आना। अभी एक-दो दिन मेरी लाश की दुर्गति होगी, तब तक तुम आ सकोगी। चन्दा, आदमी को पाप नहीं, पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था। बच्चे को लेकर जरूर चली आना।

जगपती- कानून को उसने लिखा था, “किसी ने मुझे मारा नहीं है, क़िसी आदमी ने नहीं। मैं जानता हूं कि मेरे जहर की पहचान करने के लिए मेरा सीना चीरा जाएगा। उसमें जहर है। मैंने अफीम नहीं, रूपए खाए हैं। उन रूपयों में कर्ज क़ा जहर था, उसी ने मुझे मारा है। मेरी लाश तब तक न जलाई जाए, जब तक चन्दा बच्चे को लेकर न आ जाए। आग बच्चे से दिलवाई जाए। बस।”

राजा निरबंसिया कहानी की समीक्षा

रघुवीर सिन्हा ने लिखा है कि, “यह दो युगों, दो भिन्न चरित्र-नायकों की कहानी बन जाती है। एक राजा निरबंसिया- जो पौराणिक या ऐतिहासिक है, अथवा लोक-कलात्मक है और दूसरा राजा निरबसिया जो इस युग में अपनी सम्पूर्ण जीवंतता के साथ आज के जटिल जीवन में संघर्ष करना चाहता है।”[6]

दंत परम्परा के रूप में एक कहानी राजा निरबसिया की चलती है और साथ ही साथ आधुनिक युग के जगपती नामक एक-दूसरे व्यक्ति की थी। यह कहानी “पूर्णतः अतिशयोक्तिपूर्ण, परम्पराबद्ध तथा आदर्शवादी है। इसमें नैतिक मूल्यों की स्थापना की गई है।”[7]

राजा निरंबसिया तथा जगपती दोनों विभिन्न समय के होते हुए भी एक ही मनोदशा से गुजर रहे हैं, परन्तु दोनों की प्रतिक्रियाएँ एकदम भिन्न हैं। दो युगों के इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए ही इन कहानियों को साथ-साथ कमलेश्वर ने रखा है। इस कहानी में कस्बाई मनोवृत्तियाँ बड़े सूक्ष्म रूप से स्पष्ट हुई है। कस्बाई मनोवृत्तियों की बड़ी विशेषता यह होती है कि वे एक-दूसरे के जीवन में रुचि लेते हैं, ताक-झांक करते हैं।

कोई भी सामान्य सी घटना सारे कस्बे में चर्चा का विषय बन जाया करती है। ‘राजा निरंबसिया’ में चंदा के बच्चे होने की खबर आग की तरह फैल जाती है। जो जहाँ था वहीं रूक कर हाल लेने लगता है। कस्बाई जीवन-परिवेश की इस मनोस्थितियों की पहचान कमलेश्वर की यह कहानियाँ देती है।

‘राजा निरबंसिया’ कहानी में पुरुष तो पुरुष, गाँव की स्त्रियाँ भी जगपती की कापुरुषता पर व्यंग्य करती हैं। वह तो तन, मन, इज्जत, पैसे के कर्ज से डूबा है। उसकी चाची भी पास से गुजरने पर कहती है कि “आ गए सत्यानासी! कुलबोरन!” चंदा खुद भी कहती है कि तुम्हारे कभी कुछ न होगा।परन्तु उसका एक रूप और है वह अपने बीमार पति को बचाने के लिए अस्पताल के कम्पाउण्डर से समर्पित हो गई। ताकि पति की दवाईयों की व्यवस्था हो सके। परन्तु इस समर्पण से वह खुश नहीं थी।

“चंदा बहुत उदास थी। क्षण-क्षण में चन्दा के मुख पर अनगिनत भाव आ-जा रहे थे, जिसमें असमंजस था, पीड़ा थी और निहिरता। कई अदृश्य पाप कर चुकने के बाद हृदय की गहराई से किए गए पश्चाताप जैसी वास्तव में चन्दा परिस्थितियों की शिकार थी।”[8]

‘राजा निरबसिया’ कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण और शक्ति उसकी वातावरण और परिवेश का सूक्ष्म, सार्थक तथा प्रतीकात्मक चित्रण करने में विद्यमान है। चाहे कस्बे का परिवार हो, गाँव हो या अस्पताल, जहाँ भी अपने पाठक को कहानीकार ले जाता है वहाँ का प्रमाणिक चित्र साक्षात् कर देता है।

राजा निरबंसिया कहानी का भाषा और शिल्प

राजा निरबंसिया कहानी कस्बे की भाषा की सोंधी महक लिए हुए है। पात्रों एवं परिवेश और कथ्य के अनुरूप भाषा ढलती चली गई है। एक उदाहरण दृष्टव्य है- “ये हवाई बन्दूकें इन तेल पिलाई लाठियों का मुकाबला नहीं कर पायेंगी, जवानों!” कस्बाई बोली अपने रंग के साथ-साथ अर्थ-संप्रेषण-क्षमता को लेकर आई है। बोल-चाल के शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। देशज शब्द बीच-बीच में प्रभाव के साथ आ गये हैं।

कमलेश्वर ने परम्परागत भाषा का परित्याग कर नई भाषा का प्रयोग अपनी कहानियों में किया है। जिसमें प्रयोग के स्तर पर विविधता दिखाई देती है। आक्रोश, अकेलापन, तिरस्कार, टूटन आदि भावों को व्यक्त करने के लिए सूक्ष्म भाषा का प्रयोग किया है। जो खासे नये और प्रभावी हैं। ‘राजा निरबसिया’ से एक उदाहरण दृष्टव्य है- “उसके आने में और पट्टी खोलने में ऐसी लापरवाही थी, जैसे गलत बँधी पगड़ी को ठीक से बाँधने लिए खोल रहा हो।”[9] 

सर्वप्रथम ‘राजा निरबंसिया’ कहानी शिल्प और कथ्य के लिहाज से ही काफी चर्चित हुई।  “जिसको शिल्प तथा संवेदना के एतबार से, क्लासिकी रचना का दर्जा हासिल है। जिसमें दो कहानियाँ एक साथ चलती हैं और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हुई एक तीसरा अर्थ पैदा करती हैं।”[10]

दो भिन्न युगों के दो निरबंसियों की जीवन-कथा को रेखाओं की तरह एक-दूसरे को छूती और काटती हुई चलती चली जाती है। लोककथा का यह उपयोग शिल्पगत नवीनता होते हुये भी कोरा शिल्प नहीं है। और न ही यह शिल्प कहानी में बाँधा ही पहुँचता है।

‘राजा निरबंसिया’ में कमलेश्वर ने शिल्प के माध्यम से दो युगों के बदलाव को दिखाया है। एक लोककथा जो अवचेतन मन में है, दूसरी ‘जगपती’ की आधुनिक कथा के माध्यम से नये सन्दर्भो को व्यक्त किया है। दोनों कथाएँ परस्पर विरोधी है, परन्तु इन विरोधी कहानियों से ही दोनों युगों के अन्तर का पता चलता है। “जब वर्तमान की कथा के जगपती और चन्दा का दर्द, मन का पश्चाताप, और व्यथा का बोझ लेखक सीधे-सीधे नहीं कह पाता है तो उसकी सांकेतिक अभिव्यंजना के लिए लोक कथा का घटना-क्रम वर्जित होने लगता है। चन्दा के बाल-बच्चा जगपती का नहीं अपितु बच्चन सिंह कंपाउंडर का है, यह बताने के लिए लोक कथा का ही सांकेतिक रूप में प्रयोग किया गया है।”[11]

धनंजय वर्मा का मानना है कि, ‘राजा निरबसिया दृष्टि या चेतना से अधिक रूप (फार्म) के संक्रमण (ट्रान्जीशन) का प्रतीक है। निसंदेह कमलेश्वर ने इस कहानी में शिल्प के प्रति सजगता दिखाई है, परन्तु इससे अनुभूति की प्रखरता में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि इस कहानी में भीतरी यातना तीव्रता के साथ व्यक्त हुई है।

कमलेश्वर के कहानियों का प्रारम्भ और अंत बड़ा आकर्षक होता है। अधिकाश कहानियों का आरम्भ लोक कथा की शैली में होता है। ‘राजा निरबसिया’ की शुरूआत ही लोक कथा से होती है ‘एक राजा निरबसिया थे।’, कहीं-कहीं तो ये प्रवृत्ति कहानी के बीच में भी आ जाती है। “उनकी कहानियों का प्रारम्भ देखकर प्रायः यह अनुभूति होती है कि कहानी ‘कहने’ की चीज है और इसीलिए वक्ता-श्रोता की वार्तालाप शैली का रंग वहाँ मिलता है।”

‘नयी कहानी’ में कमलेश्वर का महत्वपूर्ण योगदान है। वे कहानी के बधे-बंधाए जिस ढांचे को तोड़कर नई तरतीब देने की कोशिश करते हैं, जिसकी शुरूआत उन्होंने ‘राजा निरबंसिया’ से की, उसे वे आगे जीवन पर्यन्त भी करते रहे।

“जगपती की यह आत्म-स्वीकृति तो अपनी जगह सही है कि ‘मैंने अफीम नहीं, रुपये खाए हैं।’ किंतु कथा का यह आदर्शवादी और भावुकतापूर्ण अंत है। इसीलिए कहानी का एकमात्र कमजोर स्थल भी यही है। अपनी पत्नी की जारज संतान का स्वीकार और उसे मन से क्षमा प्रदान करना कहानी को आदर्श का, भावुक रोमान का एक रंग दे जाती है जिसकी कहानी के यथार्थ से संगति नहीं बैठती और जो कहानी की समग्र प्रभावान्विति को ठेस पहुंचाता है।[12]


[1] जो मैंने जिया- कमलेश्वर, पृष्ठ 37

[2] उत्तर यथार्थवाद- सुधीश पचौरी, 40

[3] उत्तर यथार्थवाद- सुधीश पचौरी, 11

[4] कहानीकार कमलेश्वरः पुनर्मूल्यांकन, पुष्पपाल सिंह, पृष्ठ 66

[5] समग्र कहानियाँ, 145

[6] विरासत के अलम्बरदार, सं. प्रदीप मांडव, पृष्ठ 247

[7] कहानीकार कमलेश्वर: संदर्भ और प्रकृति, सूर्यनारायण, पृष्ठ 4

[8] कहानी नई कहानी- नामवर सिंह, 19

[9] समग्र कहानी, 132

[10] परिकथा, विश्वनाथ त्रिपाठी, 12

[11] कहानीकार कमलेश्वर पुनर्मूल्यांकन, पुष्पपाल सिंह, 198

[12] कमलेश्वर का रचना संसार- पुष्पपाल सिंह, https://www.dainiktribuneonline.com/

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