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NTA UGC NET द्वारा अनुच्छेद पर आधारित पूछे गए प्रश्न | UGC NET Hindi Quiz- 81

 यूजीसी नेट हिंदी old question paper

दोस्तों यहाँ पर यूजीसी नेट जेआरएफ हिंदी की परीक्षा के प्रश्नों को दिया जा रहा है। हिंदी क्विज का यह 81वां भाग है। यहाँ पर 2017 से लेकर 2019 तक के ugc net हिंदी के प्रश्नपत्रों में अनुच्छेद वाले प्रश्नों को एक साथ दिया जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे अनुच्छेद से संबंधित क्विज 77 से 80 में दिया गया है।

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UGC NET Hindi Quiz- 81

इन प्रश्नों को हल करने के बाद आप पाएंगे कि nat ugc net hindi में अनुच्छेद वाले प्रश्नों से जरूर 5 प्रश्न पूछा जाता है। अनुच्छेद वाले प्रश्न ugc में लगातार पूछे जाते रहे हैं, यदि इन प्रश्नों का अभ्यास कर लेंगे तो ज्यादा संभावना है ये प्रश्न गलत न हों। ugc के अलावा दूसरी कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अनुच्छेद वाले प्रश्न पूछे जाते हैं इसलिए उन्हें भी इन प्रश्नों का अभ्यास कर लेना चाहिए।

यूजीसी नेट द्वारा 2017 से 2019 तक पूछे गए प्रश्न

निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़ें और उससे संबंधित प्रश्नों 1 से 5 तक) के उत्तरों के दिए गए बहु-विकलपों में से सही विकल्प का चयन करें: (जून, 2017, II)

शासन की पहुँच प्रवृत्ति और निवृत्ति की बाहरी व्यवस्था तक ही होती है। उनके मूल या मरम तक उनकी गति नहीं होती। भीतरी या सच्ची प्रवृत्ति-निवृत्ति को जागरित रखनेवाली शक्ति कविता है, जो धर्म-क्षेत्र में शक्ति-भावना को जगाती रहती है। भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है। अपने मंगल और लोक के मंगल का संगम उसी के भीतर दिखाई पड़ता है। इस संगम के लिए प्रकृति के क्षेत्र के बीच मनुष्य को अपने हृदय के प्रसार का अभ्यास करना चाहिए। जिस प्रकार ज्ञान नरसत्ता के प्रसार के लिए है, उसी प्रकार हृदय भी। रागात्मिका वृत्ति के प्रसार के बिना विश्व के साथ जीवन का प्रकृत सामंजस्य घटित नहीं हो सकता। जब मनुष्य के सुख और आनंद का मेल शेष प्रकृति के सुख-सौंदर्य के साथ हो जाएगा जब उसकी रक्षा का भाव तृणगुल्म, वृक्ष-लता, पशु-पक्षी, कीट-पतंग सबकी रक्षा के भाव के साथ समन्वित हो जाएगा, तब उसके अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा और वह जगत् का सच्चा प्रतिनिधि हो जाएगा। काव्य-योग की साधना इसी भूमि पर पहुँचने के लिए है।

 

1. कविता की गति कहाँ तक होती है?

(A) निवृत्ति के मूल तक

(B) प्रवृत्ति और निवृत्ति की भीतरी व्यवस्था तक

(C) प्रवृत्ति और निवृत्ति की बाहरी व्यवस्था तक

(D) प्रवृत्ति के मरम तक


2. व्यापक मंगल भाव का संगम कहाँ दिखाई पड़ता है?

(A) शासन में

(B) भक्ति में

(C) धर्म में

(D) कविता में


3. जीवन में स्वाभाविक सामंजस्य कैसे संभव है?

(A) रागात्मिका वृत्ति के प्रसार से

(B) सुख और आनंद में

(C) प्रकृति के सौंदर्य में

(D) आत्ममंगल में


4. मनुष्य जगत् का सच्चा प्रतिनिधि कैसे बन सकता है?

(A) मनुष्य के मंगल और शेष प्रकृति के कल्याण-भाव से

(B) मनुष्य को सुख-आनंद देने में

(C) प्रकृति के रक्षा-भाव से

(D) मनुष्येतर प्राणियों के कल्याण से


5. ‘काव्य-योग की साधना’ से तात्पर्य है:

(A) वैयक्तिक सुख-दुख

(B) प्रकृति प्रेम

(C) लोकमंगल

(D) रसात्मक अनुभूति


निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यान से पढ़िये और उससे संबंधित प्रश्नों (प्रश्न 6 से 10) के दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। (नवम्बर, 2017, II)

“फल की विशेष आसक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है; चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत कम या बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाये। श्रीकृष्ण ने कर्म-मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया; पर उनके समझाने पर भी भारतवासी इस वासना से ग्रस्त होकर कर्म से तो उदास हो बैठे और फल के इतने पीछे पड़े कि गली में ब्राह्मण को एक पेठा देकर पुत्र की आशा करने लगे, चार आने रोज का अनुष्ठान कराके व्यापार से लाभ, शत्रु पर विजय, रोग से मुक्ति, धन-धान्य की वृद्धि तथा और भी न जाने क्या-क्या चाहने लगे। आसक्त प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे आसक्ति उसी में चाहिए। फल दूर रहता है, इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है।''


6. “फल की विशेष आसक्त से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है।” इस कथन के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि:

(A) कर्म करते समय फल के बारे में नहीं सोचना चाहिए

(B) फल के बारे में अधिक आसक्त से कर्म करने में रुचि घटती है

(C) फल के बारे में अधिक आसक्त से कर्म के प्रति उत्साह में इजाफा होता है

(D) फल के लालच में जल्दी-जल्दी कर्म करना दुर्घटना का कारण हो सकता है


7. “श्रीकृष्ण ने कर्म मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया था।” से तात्पर्य है-

(A) श्रीकृष्ण ने कहा था कि सिर्फ कर्म करते जाओ और फल की चिन्ता न करो

(B) श्रीकृष्ण ने कहा था कि कर्म करते जाओ सिर्फ फल की चिन्ता न करो

(C) श्रीकृष्ण ने कहा था कि यदि तुम निष्ठापूर्वक कर्म करोगे तो फल अवश्य मिलेगा

(D) श्रीकृष्ण ने कहा था कि फल में आसक्ति की अधिकता कर्म के प्रति उत्साह में बाधक होती है


8. “आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है।” क्योंकि:

(A) जो प्रस्तुत नहीं है उसकी इच्छा संकट का कारण बन सकती है

(B) जो प्रस्तुत नहीं है उसमें रुचि पैदा नहीं हो सकती है

(C) कर्म प्रस्तुत होता है इसलिए उसके प्रति रुचि स्वाभाविक है

(D) अप्रस्तुत की आकांक्षा मानसिक स्वास्थ्य की पहचान नहीं है


9. चार आने रोज का अनुष्ठान कराके व्यापार से लाभ की आशा करना गीता के विरुद्ध क्यों है?

(A) इसमें वासना मिली हुई है

(B) इसमें कम खर्च करके ज्यादा प्राप्त करने की लालसा है

(C) इस कर्म में उत्साह के साथ लोभ जुड़ा है

(D) इसके पीछे अंधविश्वास है


10. उपर्युक्त अवतरण में ‘फल की विशेष आसक्ति’ से लेखक का क्या अभिप्राय है?

(A) कर्म के प्रति अत्यधिक अनुराग

(B) फल के प्रति अत्यधिक लोभ

(C) कर्म और फल दोनों के प्रति अत्यधिक लोभ

(D) कर्म के प्रति अनुराग और फल के प्रति उदासीनता


निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उससे संबंधित प्रश्नों (प्रश्न-संख्या 11 से 15) के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए: (जून, 2018, II)

सौंदर्य किसे कहते हैं? प्रकृति, मानव-जीवन तथा ललित कलाओं के आनंददायक गुण का नाम सौंदर्य है। इस स्थापना पर आपत्ति यह की जाती है कि कला में कुरूप और असुंदर को भी स्थान मिलता है; दुःखांत नाटक देखकर हमें वास्तव में दुःख होता है; साहित्य में वीभत्स का भी चित्रण होता है; उसे सुंदर कैसे कहा जा सकता है? इस आपत्ति का उत्तर यह है कि कला में कुरूप और असुंदर विवादी स्वरों के समान हैं जो राग के रूप को निखारते हैं। वीभत्स का चित्रण देखकर हम उससे प्रेम नहीं करने लगते; हम उस कला से प्रेम करते हैं जो हमें वीभत्स से घृणा करना सिखाती है। वीभत्स से घृणा करना सुंदर कार्य है या असुंदर? जिसे हम कुरूप, असुंदर और वीभत्स कहते हैं, कला में उसकी परिणति सौंदर्य में होती है। दुःखांत नाटकों में हम दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। हमारी सहानुभूति अपने तक, अथवा परिवार और मित्रों तक सीमित न रहकर एक व्यापक रूप ले लेती है। मानव-करुणा के इस प्रसार को हम सुंदर कहेंगे या असुंदर? सहानुभूति की इस व्यापकता से हमें प्रसन्न होना चाहिए या अप्रसन्न? दुःखांत नाटकों अथवा करुण रस के साहित्य से हमें दुःख की अनुभूति होती है किंतु यह दुःख अमिश्रित और निरपेक्ष नहीं होता। उस दुःख में वह आनंद निहित होता है जो करुणा के प्रसार से हमें प्राप्त होता है। इसके सिवा इस तरह के साहित्य में हम बहुधा मनुष्य को विषम परिस्थितियों से वीरता पूर्ण संघर्ष करते हुए पाते हैं। संघर्ष का यह उदात्त भाव दुःख की अनुभूति को सीमित कर देता है। वीर मनुष्यों का यह संघर्ष हमें अपनी परिस्थितियों के प्रति सजग करता है, उनकी पराजय भी प्रबुद्ध दर्शकों तथा पाठकों के लिये चुनौती का काम करती है। उनकी बेदना हमारे लिये प्रेरणा बन जाती है। आनंद को इस व्यापक रूप में लें, उसे इन्द्रियजन्य सुख का पर्यायवाची ही न मान लें, तो हमें करुणा और बीभत्स के चित्रण में सौंदर्य के अभाव की प्रतीति न होगी।


11. साहित्य में वीभत्स का भी चित्रण सुंदर होता है, क्योंकि:

(A) वीभत्स को ही काव्यशास्त्र में प्रमुख रस माना गया है

(B) कला में असुंदर और कुरूप का सौंदर्य में रूपांतरण होता है

(C) कला वीभत्स से घृणा करना नहीं सिखाती

(D) वीभत्स का चित्रण आकर्षक होता है


12. इनमें से कौन-सा कथन सही है?

(A) वीर मनुष्यों की पराजय आनंद का मूल कारण है

(B) दुःखांत नाटकों में सहानुभूति के स्वजनों तक सीमित न रहने से मानव-करुणा का प्रसार होता है

(C) दुःखांत नाटक दूसरों के दुःख से जुड़े होने के कारण हमारे दुःख का कारण नहीं बनते

(D) प्रबुद्ध दर्शक और पाठक दुःख को एक सीमित भाव मानते हैं


13. इनमें से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) वीर मनुष्यों की वेदना सामाजिक के लिए प्रेरणा बन जाती है

(B) करुण रस के साहित्य में मनुष्य प्राय: विपरीत स्थितियों में संघर्षरत होता है।

(C) संघर्ष का औदात्य दुःख को सीमित करता है

(D) दुःख में आनंद की अनुपस्थिति होती है


14. दुःखान्त नाटकों में सौंदर्य की उपस्थिति का आधार क्‍या है?

(A) उनमें कुरूप और असुंदर को महत्त्व दिया जाता है

(B) सभी दुःखान्त नाटक प्राय: महान्‌ होते हैं

(C) दुःखान्त नाटकों में मानव-करुणा का प्रसार होता है

(D) दुःखान्त नाटकों में नाटककार स्वानुभूति का चित्रण करता है


15. करुण रस के साहित्य में आनंद निहित होता है क्योंकि:

(A) आनंद मात्र इंद्रिय-जन्य सुख है

(B) साहित्य में करुण रस अपरिहार्य है

(C) इस साहित्य के मूल में सहानुभूति की व्यापकता है

(D) साहित्य में दुःख की निरपेक्ष स्थिति है


निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। (दिसम्बर, 2018, II)

बिंबविधान बहुत से विश्रृंखल क्षणों का एक समुच्चय होता है। उसका आधार जीवन और जगत्‌ की ‘अनेकता’ में हैं इसके विपरीत प्रतीक किसी सूक्ष्म और गहरी ‘एकता’ का बोधक होता है। इसीलिए प्रतीकों की योजना में जाने-अनजाने एक तार्किक संगति अवश्य रहती है। परन्तु बिंबविधान में तार्किक संगति का पाया जाना लगभग असंभव है, और यदि पायी भी जाती है तो वह उसकी तीव्रता को कम करती है, बढ़ाती नहीं। प्रतीक का स्रोत कवि के व्यक्तिगत अनुषंगों में हो सकता है, परन्तु उसका आकलन आनुषंगिक नियमों के आधार पर नहीं होता। उस के निर्माण में, अज्ञात रूप से ही सही, एक प्रकार की अन्तर्दृष्टि या सूक्ष्म बौद्धिक प्रेरणा अवश्य रहती है, परन्तु बिंब का सम्पूर्ण ढाँचा आनुषंगिक नियमों के द्वारा बुना जाता है। इसलिए उसके संघटन के प्राय: अबौद्धिकता, अन्तविरोध और व्यतिक्रम पाया जाता है। प्रतीक मूर्त और अमूर्त दोनों ही हो सकता है। इसके विपरीत बिंब के लिए ज्ञानेन्द्रिय के किसी भी स्तर पर मूर्त होना आवश्यक है। यह मूर्तता केवल दृष्टि विषयक ही नहीं होती; नाद, घ्राण और स्वादपरक हो सकती है। प्रतीक किसी वस्तु का चित्रांकन नहीं करता, केवल संकेत द्वारा उसकी किसी विशेषता को ध्वनित करता है। इसलिए प्रतीक का ग्रहण संदर्भ से अलग और एकांत रूप से भी संभव हो सकता है पर बिंब की प्रेषणीयता उसके पूरे संदर्भ के साथ होती है।


16. प्रतीक के आकलन का आधार क्‍या है?

(A) व्यक्तिगत अनुषंग

(B) अन्तर्दृष्टि या सूक्ष्म बौद्धिक प्रेरणा

(C) ज्ञानेन्द्रिय के स्तर पर अनिवार्यत: मूर्त्त होना

(D) वस्तु का चित्रांकन करना


17. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(A) बिंब ज्ञानेन्द्रिय के स्तर पर मूर्त्त नहीं होता

(B) बिंब-विधान में तार्किक संगति रहती है

(C) बिंब-विधान बहुत-से विशृंखल क्षणों का समुच्चय नहीं है

(D) बिंब की प्रेषणीयता उसके पूरे संदर्भ के साथ होती है


18. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) प्रतीक में तार्किक संगति अवश्य रहती है

(B) प्रतीक संकेत द्वारा वस्तु की विशेषता ध्वनित करता है

(C) प्रतीक का आधार जीवन की अनेकता है

(D) प्रतीक का ग्रहण संदर्भ से अलग एकांत रूप में संभव है


19. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(A) तार्किक संगति बिंब की तीव्रता को बढ़ाती है

(B) प्रतीकों में तार्किक संगति का अभाव होता है

(C) बिंब के संघटन में अबौद्धिकता, अन्तर्विरोध और व्यतिक्रम नहीं होता

(D) बिंब का ढांचा आनुषंगित नियमों द्वारा बुना जाता है


20. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(A) बिंब की मूर्तता केवल दृष्टि विषयक होती है

(B) बिंब का ज्ञानेन्द्रिय के किसी स्तर पर मूर्त होना अनिवार्य है

(C) मूर्तता नाद, घ्राण या स्वाद से संबंधित नहीं होती

(D) बिंब ज्ञानेन्द्रिय से असम्बद्ध होता है


निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। (जून, 2019. II)

भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वस्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का संबंध उस अर्थ से है जिसमें कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है। राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरूप जैसा प्रतिभासित होता है उसका वर्णन वे उसी रूप में करते हैं। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्योंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुंदर के साथ असुंदर का चित्रण सुंदर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुंदर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य के साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएवं असुंदर या अशिव का चित्रण सुंदर और शिव के संप्रेषण के लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्योंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुंदर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौंदर्यवोध के नए व्यापक धरातल में सुंदर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिन्नता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक संदर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है कि इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।

-उपर्युक्त अनुच्छेद के आधार पर 21 से 25 तक के प्रश्नों का उत्तर दें-


21. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर का समावेश रहता है

(B) काव्य का मूल प्रयोजन सत्य के रूप में ही अभिव्यक्त होता है

(C) कवि क्योंकि लोक की यात्रा करता है, इसलिए सुंदर के साथ असुंदर का चित्रण संभव नहीं

(D) अशिव का चित्रण शिव के चित्रण के लिए अनिवार्य है


22. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(A) काव्य का सत्य अनिवार्य रूप से मानव-कल्याण का साधन नहीं है

(B) काव्य का सत्य तथ्यात्मक होता है

(C) काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से अभिन्न होता है

(D) काव्य का सत्य अनुभूतिपरक है


23. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानव-लोक में होती है

(B) काव्य के अर्थ का आधार कल्पना और सौंदर्य है

(C) काव्य के कर्ता वस्तुओं का वर्णन उसी रूप में नहीं करते जैसा उन्हें प्रतिभासित होता है

(D) भारतीय काव्य-मनीषा ने अर्थ की सीमा का भी अन्वेषण किया है


24. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में काव्य-मनीषियों की दृष्टि से समन्वयात्मक होने का आधार क्या है?

(A) उसका मनोवैज्ञानिक यथार्थ से जुड़ा होना

(B) मनोवैज्ञानिक यथार्थ और आदर्शवाद से जुड़ा होना

(C) प्रगतिवाद के सैद्धान्तिक आधार को अपनाना

(D) आदर्शवादी दार्शनिकता से जुड़ा होना


25. उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार काव्य-मनीषियों की प्रगतिशील दृष्टि का आधार क्या है?

(A) काव्य को तथ्यात्मक रूप में चित्रित करना

(B) समन्वयात्मक दृष्टि को अपनाना

(C) काव्य में अशिव और असुंदर को प्रमुखता देना

(D) कल्पना को काव्य का आधार बनाना


निम्नलिखित अनुच्छेद का ध्यानपूर्वक पढ़ कर उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर दिए गए विकल्पों में से चुनिए। (दिसम्बर, 2019. II)

भावना को मूर्त रूप में रखने की आवश्यकता के कारण कविता की भाषा में दूसरी विशेषता यही रहती है कि उसमें जाति संकेत वाले शब्दों की अपेक्षा विशेष-रूप-व्यापार सूचक शब्द अधिक रहते हैं। बहुत से ऐसे शब्द होते हैं जिनसे किसी एक का नहीं बल्कि बहुत से रूपों या व्यापारों का एक साथ चलता-सा अर्थ ग्रहण हो जाता है। ऐसे शब्दों को हम जाति-संकेत कह सकते हैं। ये मूर्त विधान के प्रयोजन के नहीं होते। किसी ने कहा “वहाँ बड़ा अत्याचार हो रहा है।” इस अत्याचार शब्द के अंतर्गत मारना-पीटना, डाँटना-डपटना, लूटना-पाटना इत्यादि बहुत से व्यापार हो सकते हैं, अतः “अत्याचार शब्द के सुनने से उन सब व्यापारों की एक मिली-जुली अस्पष्ट भावना थोड़ी देर के लिए मन में आ जाती हैं; कुछ विशेष व्यापारों का स्पष्ट चित्र या मूर्त रूप नहीं खड़ा होता। इससे ऐसे शब्द कविता के उतने काम के नहीं। थे तत्त्व-निरूपण, शास्त्रीय विचार आदि में ही अधिक उपयोगी होते है। भिन्न-भिन्न शास्त्रों में बहुत से शब्द तो विलक्षण ही अर्थ देते हैं और पारिभाषिक कहलाते हैं। शास्त्र-मीमांसक या तत्त्व-निरूपक को किसी सामान्य तथ्य या तत्त्व तक पहुँचने की जल्दी रहती है, इससे वह किसी सामान्य धर्म के अन्तर्गत आने वाली बहुत सी बातों को एक मानकर अपना काम चलाता है; प्रत्येक् का अलग-अलग दृश्य देखने में नहीं उलझतता।

पर कविता कुछ वस्तुओं और व्यापारों को मन के भीतर मूर्त रूप में लाना और प्रभाव उत्पन्न करने के लिए कुछ देर रखना चाहती है। अत: उक्त प्रकार के व्यापक अर्थ-संकेतों से ही उसका काम नहीं चल सकता। इससे जहाँ उसे किसी स्थिति का वर्णन करना रहता है, वहाँ वह उसके अन्तर्गत सबसे अधिक मर्मस्पर्शिनी कुछ विशेष वस्तुओं या व्यवहारों को लेकर उनका चित्र खड़ा करने का आयोजन करती है। यदि कहीं के घोर अत्याचार का वर्णन करना होगा तो वह कुछ निरपराथ व्यक्तियों के वध, भीषण यन्त्रणा, स्त्री-बच्चों पर निष्ठुर प्रहार आदि क्षोभकारी दृश्य सामने रखेगी। “वहाँ घोर अत्याचार हो रहा है” इस वाक्य द्वारा वह कोई प्रभाव नहीं उत्पन्न कर सकती। अत्याचार शब्द के अंतर्गत न जाने कितने व्यापार आ सकते हैं, अतः उसे सुनकर या पढ़कर सम्भव है कि भावना में एक भी व्यापार स्पष्ट रूप से न आये या आये भी तो ऐसा जिसमें मर्म को क्षुब्ध करने की शक्ति न हो।

26. जाति संकेत वाले शब्दों की क्या विशेषता है?

(A) विशिष्ट रूप-व्यापारों का विशिष्टतापरक अर्थ देना

(B) मूर्त्त विधान के लिए विशेष रूप से प्रयोजनीय

(C) तत्त्व निरूपण में अधिक उपयोगी

(D) शास्त्र मीमांसक के लिए अनुपयोगी


27. इनमें से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) सामान्य धर्मवाली बातें तत्त्व निरूपक के लिए अनुपयोगी हैं

(B) जाति संकेतक शब्दों को सुन-पढ़ कर भावना में एक ही व्यापार स्पष्ट रूप से नहीं आ पाता

(C) वध, भीषण यंत्रणा, स्त्री-बच्चों पर निष्ठुर प्रहार के क्षोभक दृश्य कविता में त्याज्य हैं

(D) विलक्षण अर्थ के प्रतिपादक शब्द पारिभाषिक शब्द कहलाते हैं


28. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(A) व्यापक अर्थ संकेतक शब्द मर्मस्‍पर्शी व्यवहारों के चित्रण में सर्वाधिक सक्षम हैं

(B) कविता का काम स्थिति विशेष के लिए अनेक घटनाओं, अवस्थाओं और स्थितियों को सामने लाना है

(C) कविता के लिए वस्तुओं और व्यापार को मन में कुछ देर संचित रखना अपेक्षित होता है

(D) कविता का काम व्यापक अर्थ संकेतों से नहीं चल सकता


29. कविता में विशेष व्यापार सूचक शब्दों का प्रयोग अधिक क्यों होता है?

(A) विशेष व्यापार सूचक शब्द शास्त्र मीमांसा के अनुकूल है

(B) कविता का अभिप्रेत भावना को मूर्त्त रूप में रखना है

(C) कविता में पारिभाषिक शब्दों की अधिक अपेक्षा होती है

(D) कविता विशिष्ट का नहीं सामान्य का चित्रण करती है


30. ‘वहाँ बड़ा अत्याचार हो रहा है’ इस वाक्य की क्या विशेषता है?

(A) मर्म को क्षुब्ध करने की शक्ति से संपन्न होना

(B) एक ही विशेष कार्य व्यापार की स्पष्ट सूचना देना

(C) कई अस्पष्ट भावों का संकेतक होना

(D) कविता-कर्म के अनुकूल होना


निम्नलिखित अनुच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़ कर उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर दिए गए विकल्पों में से चुनिए। (दिसम्बर, 2019. II)

आधुनिकता क्‍या है? शब्दार्थ पर विचार कर तो ‘अधुना’ या इस समय जो कुछ है वह आधुनिक है। पर ‘आधुनिक’ का यही अर्थ नहीं है। यह बराबर देखते हैं कि कुछ बातें इस समय भी ऐसी हैं जो आधुनिक नहीं है, बल्कि मध्यकालीन हैं। सभी भावों के मूल में कुछ पुराने संस्कार और नये अनुभव होते हैं। यह समझना गलत है कि किसी देश के मनुष्य सदा सर्वदा किसी विचार या आचार को एक ही समान मूल्य देते आये हैं। पिछली शताब्दी में हमारे देशवासियों से अपने अनेक पुराने संस्कारों को भुला दिया है और बचे संस्कारों के साथ नये अनुभवों को मिलाकर नवीन मूल्यों की कल्पना की है। वैज्ञानिक तथ्यों के परिचय से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के दबाव और आधुनिक शिक्षा की मानवतावादी दृष्टि के बहुल प्रचार से, हमारी पुरानी मान्यताओं में बहुत अन्तर आ गया है। उदाहरण के लिए साहित्य को लें। आज से दो सौ वर्ष पहले का सहृदय साहित्य में जिन बातों को बहुत आवश्यक मानता था, उनमें से कई अब उपेक्षणीय हो गयी हैं। और जिन बातों को वह त्याज्य समझता था, उनमें से कई अब उतनी अस्पृश्य नहीं मानी जातीं। आज से दो सौ वर्ष पहले के सहृदय को उस प्रकार के दुःखांत नाटकों की रचना अनुचित जान पड़ती थी जिनके कारण यवन (ग्रीक) साहित्य इतना महिमामंडित समझा जाता है और जिन्हें लिखकर शेक्सपियर संसार के अप्रतिम नाटककार बन गये हैं। उन दिनों कर्मफलप्राप्ति की अवश्यम्भाविता ओर पुर्जन्म में विश्वास इतने दृढ़ भाव से बद्धमूल थे कि संसार की समंजस व्यवस्था में किसी असामंजस्य की बात सोचना एकदम अनुचित जान पड़ता था। परन्तु अब यह विश्वास शिथिल होता जा रहा है और मनुष्य के इसी जीवन को सुखी और सफल बनाने की अभिलासा प्रबल हो गयी है। समाज के निचले स्तर में जन्म होना अब किसी पुराने पाप का फल (अतएव घृणास्पद) नहीं माना जाता, बल्कि मनुष्य की विकृत समाज-व्यवस्था का परिणाम (अतएव सहानुभूतियोग्य) माना जाने लगा है। इस प्रकार के परिवर्तन एक-दो नहीं अनेक हुए हैं और इन सब के परिणामस्वरूप सिर्फ हमारी प्रकाशन-भंगिमा में ही अंतर नहीं आया है, उसके उपभोग या ग्रहण के तौर-तरीकों में भी फर्क पड़ गया है। साहित्य के जिज्ञासु को इन परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की ठीक-ठीक जानकारी नहीं हो तो वह बहुत-सी बातों के समझने में गलती कर सकता है; फिर परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करके ही हम यह सोच सकते हैं कि परिस्थितियों के दबाव से जो परिवर्तन हुए है उनमें कितना अपरिहार्य है, कितना अवांछनीय है और कितना ऐसा है जिसे प्रयत्न करके वांछनीय बनाया जा सकता है।

31. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में हमारी पुरानी मान्यताओं के बदलाव का क्या कारण है?

(A) आधुनिक शिक्षा की मानवतावादी दृष्टि का विशेष प्रचार

(B) सहृदय की साहित्यिक धारणा में अपरिवर्तन

(C) दुःखांत नाटक को महत्व देना

(D) केवल इस जीवन के सुख के प्रति उपेक्षा भाव


32. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में इनमें से कौन-सा कथन सही है?

(A) इस समय की बातों का मध्यकालीन होना

(B) भावों का अनुभव और संस्कार से कोई संबंध नहीं है

(C) नवीन मूल्यों की स्थापना पुराने बचे संस्कारों के साथ नए अनुभवों को मिलाकर की जाती है

(D) साहित्य के जिज्ञासु के लिए परिवर्तमान मूल्यों की जानकारी अपेक्षित नहीं है


33. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में हमारे देश के सहृदय की दो सौ वर्ष पूर्व क्या स्थिति थी?

(A) वह दुःखांत नाटकों को महिमा मंडित करके देखता था

(B) उसका कर्म-फल प्राप्ति की अवश्यम्भाविता और पुनर्जन्म में दृढ़ विश्वास था

(C) वह संसार की व्यवस्था को अनिवार्यत: असमंजस मानता था

(D) वह जिन्हें तब त्याज्य समझता था, वह आज भी उसके लिए अस्पर्शनीय है


34. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की ठीक-ठीक जानकारी से साहित्य का जिज्ञासु जो करता है उसका निम्नलिखित में से किसका संबंध नहीं है?

(A) परिस्थितियों के दबाव से उत्पन्न परिवर्तनों की अपरिहार्यता को पहचान पाता है

(B) आयास पूर्वक अवांछनीय को वांछनीय बनाया जा सकता है

(C) नवीन प्रकाशन-भंगिमा को अपना सका है

(D) समाज के निचले स्तर के लोगों के प्रति घृणा की संगति खोज सका है


35. उपर्युक्त अनुच्छेद के संदर्भ में इनमें से कौन-सा कथन सहीं है?

(A) किसी देश के मनुष्य सदैव ही विचार विशेष को समान मूल्य देते रहे हैं

(B) पुरानी मान्यताओं के बदलाव में वैज्ञानिक तथ्यों की जितनी भूमिका है, उतनी आर्थिक परिस्थितियों के दबाव की नहीं

(C) सभी भावों के मूल में पुराने संस्कार और नए अनुभव होते हैं

(D) सभी भावों के मूल में पुराने संस्कार और नए अनुभवों का कोई योगदान नहीं होता

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